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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



मेरा शहर


नरेंद्र श्रीवास्तव


 
मेरा शहर
बंट गया है
टुकड़े-टुकड़े में

बचपन के साथी
जो कभी एक साथ
खेलते-कूदते थे
पढ़ते-लिखते थे
दूर-दूर हो गये हैं

कोई किसी
राजनीतिक दल में हैं
तो कोई किसी में
राजनीति में सभी हैं

अब हम
एक-दूसरे की 
मदद नहीं करते
बल्कि
परस्पर छींटाकशी करते हैं

हमारे शहर की
सड़कों में
गड्ढे हो रहे हैं
शाला भवन की खपरैल
उखड़ गई है
चौराहे पर
स्टेच्यू
नहीं लग पा रहा है

बहस
होती रहती है
हर वक्त
काम नहीं हो पा रहा है
शहर में

एक फंसाता है
दूसरा छुड़ाता है
एक बनाता है
कोई योजना
दूसरा
अड़ंगा रगाता है

बीमार पड़ता है
कोई
तो देखने आते हैं
उससे संबंधित
राजनीतिक दल के

क्या होगा
मेरे शहर का?
कैसे होगा विकास?
दुःखी होता है मन
होता हूं निराश

कब हम
पनपते इस बिखराव को
तोड़ सकेंगे

शहर के
हर एक को
राजनीति के रंग से नहीं
अपनत्व के 
ढंग से जोड़ सकेंगे।
    
  

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