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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



द्यूत-सभा


मोहिनी झा


 
अवसर दिया तुम्हें, पासे थामो, 
क्या सब कुछ वापस पाना है? 
चुप क्यों हो धर्मराज, बोलो-
द्रौपदी का दांव लगाना है?

मति भ्रष्ट हुई युधिष्ठिर की, 
बोला - "यह लो! दांव लगाया!" 
शकुनि ने पासे फेंके तो चीखा-
"हाय! यह पाप मैं कैसे कर पाया! "

अतिरिक्त कौरवों के सब जन
नयनों से क्षोभ बहाते थे,
और छाती पीट-पीटकर सारे 
हाय! हाय! चिल्लाते थे।

दुर्योधन अट्टहास करता बोला-
"रे दास! तुम इसी क्षण जाओ, 
दासी द्रौपदी को स्वामी के सम्मुख
प्रस्तुत होने को ले आओ।"

दास भागा, रनिवास में कह डाली, 
रोकर द्यूत-सभा की कथा, 
बोला "हे रानी! अब क्या मैं करूं?" 
पांचाली बोली छिपा व्यथा -

"तनिक उस सभा में जाकर प्रश्न करो, 
जिसने यूँ मुझे पुकारा है, 
अरे! पत्नी को कैसे हार गया
जो स्वयं को पहले हारा है?"

सुन संदेश द्रुपद-कन्या का
दुशासन-दानव न फिर सह पाया, 
कुसुमों से भी कोमल केशों से खींचकर 
पांचाली को सभा में ले आया !

हाय द्रौपदी!आज तुम समग्र 
पृथ्वी के अश्रु बहाती हो, 
कुछ क्षण पहले 'साम्राज्ञी' थी, 
अब 'दासी' तुम कहलाती हो!

ऐसे में आगे आया पापियों 
के दल से विकर्ण भाई, 
बोला-"पहले उत्तर दो उसका, 
प्रश्न जो पांचाली लाई।"

"कहाँ उचित है कुलवधू को
घसीटकर सभा में ले आना? 
केशों को पीड़ा देना, 
वस्त्रों को इस तरह बिखराना?"

दानवीर अंगराज ने भी 
उगला विनाश जो मन में था, 
गिने-चुने थे पाप, सभी का, 
मोल चुकाना रण में था।

"पाँच पतियों की पत्नी किस प्रकार 
सम्मान की अधिकारिणी, कहो? 
वस्त्र बिखरें या न हों, सब उचित, 
कुलवधू नहीं, व्यभिचारिणी कहो! "

तर्क-वितर्क सब हार गए , 
दुशासन ने थामा चीर, 
द्रौपदी करती रही विलाप, 
किसी को समझ न आई पीर!

फिर छोड़ा उसने चीर, 
यूँ दोनों हाथ हवा में उठा दिए, 
स्मरण किया सखा केशव को, 
सारे भय समाज के भुला दिए।

हाँ,अंधकार होता है तभी, 
और चमत्कार हो जाता है, 
ज्यों-ज्यों खुलता जाए चीर,
त्यों-त्यों बढ़ता ही जाता है!

मित्रता के गुणों का निश्चित ही , 
कृष्ण-सा उदाहरण अन्यत्र नहीं, 
देव मनुज सब हुए बहुत, 
मित्रों में गोविंद-सा मित्र नहीं !

पितामह भीष्म,द्रोण,कृप,और विदुर
अब श्वास तनिक ले पाते हैं, 
हाथ जोड़, अश्रु-धाराएँ बहा, 
"जय जय केशव!"-सब गाते हैं!

  

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