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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



बैर भाव को छोड़ो


महेन्द्र देवांगन "माटी"



बैर भाव को छोड़ो प्यारे, हाथ से हाथ मिलाओ ।
चार दिन की जिन्दगी में, दुश्मनी मत निभाओ ।
क्या रखा है इस जीवन में, खुशियों से जीना सीखो ।
बनो सहारा एक दूजे का, तुम नया इतिहास लिखो ।
न होना निराश कभी तुम, मंजिल तुम्हे जरूर मिलेगी ।
अगर इरादा पक्का है तो, जरूर नया कोई गुल खिलेगी ।
माटी के इस जीवन को , सार्थक तुम करना सीखो ।
ऐसा कोई काम करो तुम, भीड़ भाड़ से हटकर दिखो ।
 
 

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