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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



जाने ये शहर कैसा है...


हिमान्द्री व्यास


जाने ये शहर कैसा है...
अलग - अजनबी है पर लगें अपना सा है !!

टूटे सपनों की उम्मीदों सा, बिखरे परिंदों के घरोदों सा है !
बंद आंखों कि हकीकत सा, खुली आंखों के लिए ख्वाब सा है !!
जाने ये शहर कैसा है...
शख्स अलग है, पर अक्स एक सा है !!

सवाल अनेकों है पर हर आंख में छुपा ख्वाब सा है!
नाम कुछ भी हो रिश्ता जुड़ा वो उम्मीद का है !!
खुशी में छुपा आंसु है, और हर आंसु भी ओस की बूंदों सा है !
दर्द चाहे जैसा भी हो, जीने को लगे जरुरी सा है !!

बिखरे पत्ते कहे मौसम पतझड़ का है, खिलते फूलों
से लगें मौसम बहारों सा है !
शोर करता ये शहर, शोर में भी लगें कभी खामोश सा है !!
जाने ये शहर कैसा है...
अलग है, अजनबी है, लगें अपना सा है !!!!
 
 

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