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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



चिड़िया उड़े, उड़ती जाये


हरिहर झा



चिड़िया उड़े, उड़ती जाये    

दुनिया के विष से अनजान  
लिये जाए खतरा ऐसे    
रोकेगा कैसे हिमालय  
लांघ ले नभ, पल में जैसे  

उड़ती घोसले से अपने   
चोंच में क्या कुछ समेटती   
फुरफुराती दाना लाए।   

आँखों  से ओझल, दिख जाय    
कहीं धवल किरण सी  हँसती    
जज़्बों में समेटी आँधी    
सहज तूफानो में बसती     

बिलबिलाती भूख समेटे    
व्याकुल दिल, उलझ बच्चों में   
खिला दे तब दाना खाए   

कलरव क्यों है शांत इतना    
ना  द्वेष-कलुष, न परनिंदा   
सोचे, बिन इंजिन, बिन धुँआ   
वायुयान हो कर शर्मिंदा   

क्या आन-बान बख़ान करें  
पी लेगी पूरा आकाश  
पंख फैले , नभ में छाए   

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