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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



आफत का पानी


हरिहर झा



कभी कहीं कोई बरसाता 
आफत का पानी   
तो कौन बकरा बने बलिदानी?  

लाया मुठ्ठी भर रोशनी,
अंधेरों से  लड़ा
आ धमके राहु केतु   
झपटे और ग्रहण पड़ा   
निर्दयी हाथ  ले लेते किस किसकी कुर्बानी     

डरा धमका कर गरीब को 
ले लेते हैं घेर   
पहन बघनखा खुद को 
मान लेते बब्बर  शेर    
शेखी बघार, दंभ भरे इठलाते अभिमानी  

खून भरा तिजोरी में,    
गहरे में बहुत छुपाया   
हुआ पराया हर कोई  
अपयश खूब कमाया   
तन्हाई खुद चालाकी से गुँथती निगरानी  

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