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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



उन दिनों


धर्मेन्द्र अहिरवार


जब तुम्हारी बातें मेरे संग में आती थीं
तो वो खिलकर आसमान बन जाता था
दीवारें जीने लगती थीं, किस्से मचलने लगते थे
वक़्त बीत जाता था

अभी कुछ देर और हमें
साथ रहना है
मेरे कमरे की उदासी मुझे अच्छी नहीं लगती

न बोलता है
न सुनता है
मेरा कमरा न जाने क्यों अब मौन रहता है |

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