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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



प्रेम कबूतर


धर्मेन्द्र अहिरवार


कितने ही पन्नों में
न जाने कितने कबूतर उड़े
उन दिनों में कुछ बात थी

कागज़ कबूतर था
स्याही संदेस और नज़रें उड़ान थीं
न आँखें थीं, न आंसूं थे
फिर भी, याद थी मुलाक़ात थी

एक गुमठी पे खड़े होकर
एक गुमठी को तंकते थे
आशिकों के मोहल्ले में हमारी बात थी

जो कबूतर आकर बैठता था तुम्हारी खिड़की पर
उसे सुनना था
वो मेरी ही तो आवाज़ थी

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