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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



अभिनेता


धर्मेन्द्र अहिरवार


मंच पर क़दम रखते ही
ख़ुद को, नेपथ्य में कहीं भूल आता है
फिर ऐसे जीता है
कागज़ से उधार लिया जीवन
कि उसका अपना कोई जीवन नहीं था उस वक़्त

और जीवन में, कभी नहीं चूकता
एकदम सच्चे आदमी का क़िरदार निभाने से

मैं जब भी उस क़िरदार से मिलता हूँ
वो जीवन हो जाता है
तब मैं एक इंसान से मिलता हूँ
और खुश होता हूँ
की दुनिया में सच्चा स प्यारा सा इंसान
उस आदमी कि शक्ल में हमारे बीच है

मैं चाहता हूँ
की उम्र अगर लम्बी दूरी चलना चाहती है
तो सिर्फ़ उसकी देह चुने

देखना, उम्र को अपने चुनाव पर फक्र होगा
( शोभित खरे भैया के लिए )

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