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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



मेरी माँ की कविता


चन्द्र मोहन किस्कु


           
आज दोपहर
मेरी माँ
मन में ठान लिया
लिखेगी कविता
कल, आज और कल
की बातें
बहुत सोचकर
उन्हे शब्दों में पिरोने चाहा
रचना चाहा कविता
इतने पर दस्तक हुआ
दरवाजे पर
खोलकर देखा तो
पिताजी को खड़े पाया
उन्हे ऎनक नहीं मिल रहा है
आखड़ा जाने की जल्दी है
प्यारी बहना को
पुस्तक नहीं मिल रही है
कालेज जाने की जल्दी है
और मेरी बेटी तो
अपने छोटी -छोटी कदमों से
चलकर
अपने दादी की
गले लग जाती है
मेरी माँ की सोच
शब्दों से वाक्य बनाना
छंद -अलंकार को ध्यान मे रखना
सब भूल जाती है
और उसकी कविता
मेरी बेटी के चेहरे पर
खो जाती है.

 

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