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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



वो जानता था


आशीष वैरागी



वो जानता था 
कि वो मेरे हिस्से में नही आएगा
और मैं जानता था की चाह के भी 
हांसिल नही होगा वो।
उसने रत्ती रत्ती पूरा आसमान 
मेरे हांथो में भरा और
मैंने  उसआसमान का हर एक टुकड़ा 
उसी के दुप्पटे में बांध दिया।
वो जानता था किसी जंग को तैयार नही हैं वो
मैं जानता था एक दिल रखने को 
हाजरों दिल तोड़ नही पाऊंगा मैं,
उसने मेरी आँखों मे 
अपने प्यार की चमक भर दी थी
मैंने उसकी ज़ेबों में अपना सारा वक्त भर दिया।

किसी रोज़, किसी घड़ी , किसी जगह,
मिलने का वादा हुआ था बस
मैं उसी घड़ी उसी जगह
लेकिन पता नही  वो 
वक्त से आगे था या मेरी घड़ी पीछे थी, 
वो कभी कोसता नही था मुझे 
मेरी आदतों के लिए 
और मैंने भी उससे छुपाकर 
शिकायतों का बक्सा 
दूर दरिया में डूबा दिया है।

 

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