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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



आख़री ख्वाहिश


आशीष वैरागी



टेक लगाए हूँ  बालकनी की रेलिंग से
हाँथ में कॉफी का एक कप है
और एक ग्रैंड अपार्टमेंट व्यू..
लेकिन मेरी आँखो केे सामने 
एक धुंधलाता अमीर आसमान भी है
और नीचे रेंगती गरीबी,
औऱ मैं,...

पिछली साल उस पार्क में बैठ
तुमने इसी बालकनी का इशारा किया था।
तुम्हे याद है ना !
सर्द कोहरे के बीच से तुम 
मेरे लिए गर्म चाय लाये थे
औऱ पूरी उंगलियां तान के तुमने 
मुझे ये बालकनी दिखाई थी।
और मैं, 
मैं तुम्हे व्यंग्यपूर्वक देखती रही
कॉफी की जिद करती रही
और तुम मुझे देखते रहे, मुस्कुराते रहे।
बिल्कुल बच्चों की तरह।
तुमने यहाँ वहाँ की बात की, 
सुई से सगाई तक,
प्लाट से पेंटहाउस तक।
रिश्तों की, अहमियत की
मुफ़लिसी की, अमीरियत की
नीले रंग उस हाँथ के बुने उस स्वेटर में 
तुम बहुत आसान बहुत सादा लग रहे थे
लेकिन तुम्हारी आँखों मे अजीब चमक थी
बातों में हाजरों सपने थे।
ठिठुरते होंठों से तुम अपनी चाय 
बहुत स्वाद से पीते रहे।
और मैं,
इलाइची की तेज खुशबू में भी नुक्स निकालती रही।
मैं तब भी बेचैन, बिन स्वाद, बिन अलंकार ही रही।

शायद आज भी तुम चाय उतने ही स्वाद से पीते होगे।
शायद आज भी तुम बेतरतीब, 
बिखरे-बिखरे, मासूम लगते होगे।
शायद आज भी तुम दुसरों की 
गलती छुपाने को, वैसे ही हँसते होगे।

मैं क्यो नही जान पायी?
उस दिन तुम्हारी मुस्कुराहट का राज़। 
तुम्हारे साथ चाय की चुस्कियों का 
अहसास नही ले  पायी।
आज इस बालकनी की
रेलिंग से ऊपर एक खुला आसमां है
ओर नीचे जमीन पे बिखरी पड़ी है 
लोंगों की आम जरूरतें।
इस कॉफी के कप में रुआब ओर अमीरी 
की बू आ रही है 

आज मैं उस सर्द कोहरे को चीर कर 
पार्क में रक्खी उसी बैंच की तरफ इशारा कर रही हूं
की काश तुम वहीं बैठे हो, 
की काश तुम वही दिख जाओ , 
वैसे ही मासूम, वैसे ही सादा, 
वैसे ही मुस्कुराते हुए।

सुनो! तुम्हारे साथ एक बार वो 
इलाइची वाली चाय पीनी है मुझे..
इसे तुम मेरी 
आखिरी ख्वाहिश हि समझ लो।

 
 

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