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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



मैं हारा हूँ


डॉ० अनिल चड्डा


हाँ
मैं हारा हूँ
परिस्थितियों से
हाँ
में हारा हूँ
अवसरवादियों से
हाँ 
में हारा हूँ
भ्रष्टाचारियों से
स्वार्थियों, झूठे, फरेबियों 
और मक्कारों से
और 
जीवन भर
यूँ ही
हारता रहूँगा में
जब तन
ये अवसरवादी
ये भ्रष्टाचारी रहेंगे
करते रहेंगे
समाज को
देश को बर्बाद
और में
कोने में खड़ा रहूँगा
चुपचाप
सूखे आँसू बहाते हुए
अपनी व्यथा को
शब्दों में छुपाते हुए
किसी मसीहा को
आवाज लगाते हुए

 
 

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