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वर्ष: 2, अंक 35,  अप्रैल(द्वितीय) , 2018



चेतना


रश्मि पाठक


बाहर शेरू कब से भौकता ही चला जा रहा हाए. प्रभा ने बाहर जाकर शेरू से कहा भी की ‘’ एक तो लौडस्पीकर के शोर से ऐसे ही सिर मे दर्द है, उपर से तुम भी भौक रहे हो,’’ लेकिन प्रभा की बातों का शेरू पर कोई असर न हुआ.

शेरू ने प्रभा की बात समझी भी अथवा नही यह तो मालूम नही , लेकिन प्रभा का उसके पास खड़ा होना और बोलना उसे कुछ पलों के लिए शांत कर गया था. रात के अंधेरे में शेरू की आँखें चमक उठी थी जिसे देख प्रभा को लगा कि वह भी लौडस्पीकर के शोर से परेशन और थका हुआ है. उसे देख प्रभा बोल पड़ी, ‘’क्या करें भाई शेरू, इस शोर से तो स्वंय परेशन हूँ उपर से बिज़ली नही है. लौडस्पीकर वालों ने तो अपनी व्यवस्था कर रखी है.’’ इतना कहती हुई प्रभा गेट में .लगा अंदर चली गई और शेरू बौंड्री के अंदर चक्कर कटता रहा.

दूधवाले भैया ने आज अपने समय के पहले ही दूध दे दिया है. आज देवी माँ की मूर्ति-विसर्जन का दिन है, यही कारण है कि वह आज पहले आकर दूध दे गया, वरना उसे कितनी बार कहा गया था की थोड़ा पहले आकर दूध दे जया करो ताकि बच्चे समय पर दूध पी सकें.

एक तो शोर और उपर से बिज़ली गुल, अब ऐसे में पढ़ाई कैसे हो सकती है भला. इमार्ज़ेंसी लाइट का चर्ज़ भी ख़त्म होने वाला है. देवी माँ की पूजा कल हुई थी, जब बच्चों ने अपनी कठिन लगने वाले विषयों की किताबें तस्वीर के पास रखी थी. सबों ने विधिवत पूजा-अर्चना की थी. संस्कृत के मंत्रों-श्लोकों के साथ शंख ध्वनि से वातावरण कितना पवित्र हो आया था. घर का सिर्फ़ एक सदस्य पूजा मे शामिल नही हो पाया था-शेरू. वैसे भी उसे पूजा मे कोई दिलचस्पी नही है, उसे सिर्फ़ बाहर बैठ आने-जाने वालो पर भौकना पसंद है. प्रभा को उस पर और उसके नाम पर कभी हँसी भी आती है कि नाहक ही उसका नाम शेरू रखा था. वह तो नीरा बेवकूफ़ लौडस्पीकर और पटाखों की आवाज़ से परेशन हो उठता है. ऐसे दौड़ता है जैसे कोई उसके ही पीछे लगा हो.

लगातार बजते लौडस्पीकर के गानों से सिर में दर्द हो आया है. कल देवी माँ की आराधना ख़त्म होते ही पास के पंडाल वालों ने फिल्मी गाने लगा दिए हैं. हम सबों का एक-सा हाल है और बच्चे शोर की वजह से अपनी पढ़ाई नहीं कर पा रहे इसलिए परेशान फिर रहे हैं. शाम सन्नी ने प्रभा से पूछा था कि ''जब देवी माँ की पूजा हम ज्ञान के लिए करते हैं तो लोगों ने गाने क्यूँ लगा रखे हैं ?''

''लोगों ने अपने मनोरंजन के लिए गाने लगाए हैं, उन्हें रोका तो नहीं जा सकता न. थोड़ी देर में बंद हो जाएगा, परेशान ना हो.'' इतना कह प्रभा ने शेरू को देखा था और सोचने लगी कि ''बेचारा शेरू भी क्या करे दिनभर अहाते में बैठा इस शोर को बर्दास्त करने के अलावा वह भी क्या कर सकता है.''

बिज़ली न रहने से कई काम बाधित हो जाते हैं जिसका कारण शायद इसकी आदत का हावी होना हो सकता है, यह बात प्रभा अक्सर सोचती है. दद्दू कहा करते थे कि गाँव में बहुत समय बाद बिज़ली आई थी. तब लालटेन की रोशनी में ही सारे काम हुआ करते थे और बाबूजी उसी रोशनी में देर रात तक पढ़ते रहते थे. ये सारी बातें आदतों पर ही निर्भर होती हैं. तब शायद लौडस्पीकर भी नहीं हुआ करते थे और न ही लोगों के ऐसे शौक.

रसोई से प्रभा जब अपने और बाबूजी के लिए चाय बना लाई तब चाय की प्याली लेते हुए बाबूजी ने प्रभा से पूछा, ''ये पाँचवी इंद्री कौन-सी है जो दिखती नहीं ?''

''स्पर्श,'' प्रभा ने जवाब दिया.

बाबूजी मुस्कराए, बोले, ''प्रभा जानती हो, अभी-अभी मेरे मन में एक बात याद आई जब तुमने कहा था कि तुम्हारी छठी इंद्री जागृत हो गई है.''

''छठी इंद्री के जागृत होने की बात तो मैने तब कही थी जब मैं अपने एक्सीडेंट के बाद बिस्तर पर आ पड़ी थी और उठने के लिए सहारे की ज़रूरत पड़ती थी,'' प्रभा ने कहा.

''हाँ, यह कुछ ही दिन पहले की तो बात लगती है जब तुम स्वयं हिम्मत कर चलने लगी. वर्ना हमें लगा था जैसे महीनो लग जाएँगे तुम्हें,'' बाबूजी ने कहा और चुप हो गए.

''आज अचानक ये बात आपको कैसे याद आ गई ?'' प्रभा ने पूछा.

''दरअसल आज मूर्ति-विसर्जन के दिन लोगों की भीड़, शोर-शरबों के बीच वारदातों की संभावनाएँ होती है. ऊपर से बिज़ली भी नही है. तुमने इस बात को समझा और गेट में ताला लगा कर शेरू के गले की ज़ंज़ीर खोल दी जबकि घर के दूसरे सदस्य बातों में मशगूल हैं,'' बाबूजी ने इतना कह चाय की प्याली उठा ली.''

''यह तो सामान्य-सी बात है बाबूजी. मैने छठी इंद्री जागृत होने की बात तो मज़ाक में तब कही थी, जब मैं बिस्तर पर पड़ी रहती थी. उस समय मेरा ध्यान आवाज़ों, विभिन्न ध्वनियों पर विशेष रूप से केंद्रित रहता था, जबकि लोग अपने कामों में व्यस्त रहते थे. यही वजह थी कि मैं नल ठीक से बंद न होने, किसी के मुख्य दरवाज़े पर आने की आहट आदि जैसी छोटी-छोटी बातें महसूस किया करती थी,'' प्रभा ने कहा.

‘‘छठी-इंद्री का जागृत होना ध्यान पर निर्भर करता है, और लोगों की व्यस्तता छोटी-छोटी बातों पर भी नहीं जाती.’’ बाबूजी ने धीमी आवाज में यह कहते हुए घर के भीतर कुछ इस प्रकार देखा जैसे कह राहों कि –‘‘लोग मौजूद होकर भी कहाँ होते हैं, होता है तो सिर्फ उनके होने का आभास.’’


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