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वर्ष: 2, अंक 35,  अप्रैल(द्वितीय) , 2018



ममता का कर्ज


डॉ० अनिल चड्डा


चाँदनी चौक के पूरी-छोले मुझे आज भी याद आते हैं। बुआ का घर कहाँ था, ठीक से तो याद नहीं। लेकिन इतना अवश्य ध्यान में आता है कि फव्वारे के नजदीक ही कहीं था। बुआ बेचारी अकेली ही रहती थी। न मालूम फूफा ने उन्हें त्याग दिया था या वह विधवा हो गईं थी। वैसे धूमिल सा याद पड़ता है कि जब से मैंने होश सम्भाला था, उन्हें सफेद कपड़ो में ही देखा था। इसलिये अंदाजे से ही कहा जा सकता है कि वह बहुत जल्द ही विधवा हो गईं थी।

जिसके लिये वह काम करती थीं, उसी ने उन्हें रहने को सजा-सजाया घर दे रखा था। उनके घर जाने के लिये एक मंजिला सीढियाँ तय करनी पड़ती थी। एक छोटा सा कमरा, लगभग चार दफा छ: का, जिसमें छोटे से हीटर पर वह अपना खाना पकाया करती थी। आधा लीटर दूध उबलने में भी आधा घंटा लगता था। फिर लम्बा सा तंग कमरा जिसमें पलंग भी, सोफे भी और अकेली जान के लिये न जाने क्या-क्या भर रखा था। बालकनी के चाँदनी चौक का नज़ारा देखा जा सकता था। उस वक्त तो ट्रामें भी चला करती थी। और मैं घंटों बालकनी में खड़ा ट्रामों की रेल-पेल एवँ बाजार की भीड़ के नज़ारे लिया करता था।

कहते हैं कि जब बुआ विधवा हुईं थी या फिर अपने पति से अलग हुईं थी तो उन्होंने दाई का कोर्स कर लिया था। एक बेटा भी था उनके जिसने बाद में कभी उनकी सुध नहीं ली। इसलिये, मुझसे शायद वह सबसे अधिक प्यार करती थीं। अत:, जब भी स्कूल की छुट्टियाँ होती थी, वह मुझे आ कर ले जाती थीं। बाद में पता चला कि दो भाइयों की अकेली बहन होने के बावजूद उन्हें न तो सही रूप से प्यार मिला और न ही न्याय मिल पाया। पहले पति बिछुड़ा। फिर पाकिस्तान बनने पर क्लेम में जो मकान मिला था, उसे धोखे से दस्तखत करवा कर छोटे भाई ने अपने नाम करा लिया था। मेरे पिता बड़े थे। बुआ को प्यार भी बहुत करते थे। परन्तु, अपनी पत्नी और माली हालत से मजबूर थे। सो, चाहते हुए भी कुछ नहीं करा पाते थे। मेरे पिता की मजबूरी वह समझती थीं। इसलिये मुँह से कभी कुछ नहीं कहा। अपने अंदर का सारा प्यार शायद वो मुझ पर उंडेल देना चाहती थीं।

मैं भी किस्मत का कुछ अधिक ही धनी था। जो भी देखता, मुझे बरबस प्यार करता। माँ बताया करती थी कि जब मैं पैदा हुआ था, तो सब नर्सें मेरी शक्लो-सूरत पर मोहित हो गईं थीं। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, गोरा-चिट्टा होने और घुँघराले बालों के कारण मेरे व्यक्तित्व में निखार आता चला गया। मुझे आज भी याद है जब मैं बुआ के पास जाता था तो पडौस के कमरे में एक सत्तर-पचहत्तर वर्ष के बुजुर्ग रहते थे। वह मुझे अपने कंधों पर उठाये घूमते रहते थे और जब मैं उनके गंजे सिर चपत लगा-लगा कर ‘गंजे बाऊजी, गंजे बाऊजी’ कह-कह कर तालियाँ बजाता था तो वह खूब हँसा करते थे। वह नेहरूजी के मुरीद थे। जिस दिन नेहरूजी का स्वर्गवास हुआ और उनकी अंतिम शवयात्रा जा रही थी, उस दिन क्रिकेट का मैच भी खेला जा रहा था जिसकी कमेंटरी भी रेडिओ पर आ रही थी। शायद, भारत और इंगलैंड के बीच (अच्छी तरह से या नहीं)। मैं गर्मी की छुट्टियों में बुआ के पास ही था। मस्तमौला बचपन। सो, खेलों में अधिक दिलचस्पी थी। बाऊजी ने नेहरूजी के अंतिम दर्शन अवश्य करने थे। अंतिम शवयात्रा का आँखों देखा हाल रेडियो पर सुनाया जा रहा था। वह रेडियो पर अंतिम शवयात्रा का आँखों देखा हाल सुनना चाह रहे थे ताकि जब नेहरुजी का पार्थिव शरीर एक निश्चित स्थान पर पहुँचे तो उससे अगले पॉइंट पर तत्काल साइकिल से पहुँच जायें। उधर बी.बी.सी. पर क्रिकेट की कमेंटरी भी चल रही थी। मैं उसमें ज्यादा रूचि ले रहा था। मैच रोमांचक स्थिति में था। इसलिये स्कोर सुनने के लिये बार-बार रेडियो की सुई बदल रहा था। नतीजतन बाऊजी अपने वांछित स्थान के बारे में सुन नहीं पाये और फलस्वरूप नेहरूजी के अंतिम दर्शन नहीं कर पाये। उस दिन पहली बार मैंने उनके चेहरे पर आक्रोश देखा था। परन्तु, फिर भी उनके मुँह से गुस्से का एक शब्द भी नहीं निकला। मुद्दा यह कि मेरे ऊपर चारों तरफ से लाड-प्यार की बौछार हो रही थी। मेरी शरारतें और मेरी गल्तियाँ भी सबको प्यारी लगती थीं। न तो मैं बुआ की ममता का महत्व जान पाया, और न ही प्यार के मर्म और मन की व्यथा को समझ पाया। इसे कोई बाल-बुद्धि कह ले या मुझे आवश्यकता से अधिक प्यार के कारण समझ ले कि मैं उनका मन नहीं जान पाया।

जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, मुझ पर पढाई का जोर बढ़ता गया और बुआ के यहाँ जाना घटता गया। पिता मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे और मैं बनना भी चाहता था। वो जम कर ओवरटाइम करते थे और मैं जम कर पढाई। बुआ बेचारी आती थीं और मुझे व्यस्त देख कर चली जाती थीं। शायद मुझे पढाई में जुटा देख कर उनके मन की बात मन में ही दबी रह जाती थी। बचपन में तो मैं साथ जाने की जिद करता था। अब वह कहती भी थीं तो मैं पढाई के कारण टाल देता था। प्राइवेट नौकरी के कारण वो रुक नहीं सकती थीं। सो, बिना कुछ महसूस कराये लौट जाती थीं।

फिर एक दिन अचानक पता चला कि उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। जिसके यहाँ वह काम किया करती थीं, काम कम होने के कारण अब उन्हें बुआ की जरूरत नहीं थी। अतएव रहने की जगह भी खाली करनी पड़ी। हमारे पास वह फिर भी नहीं आईं। शायद माँ के कारण। किसी दूर के रिश्तेदार के पास ठहरी थीं। फिर भी आती थीं कभी-कभी मुझसे मिलने। डॉक्टरी पूरी हुई तो प्यार से मेरा माथा चूम कर बोलीं –

“अब तो तेरी साधना पूरी हुई। अब तो बुआ के लिये वक्त निकाल पायेगा न?” मैं आवाक उनका मुँह देखता रह गया। जीवन में पहली बार समझ आई थी उनके मन की बात। परन्तु मैं विवश था। बोला –

“बुआ, अभी तो इंटर्नशिप करनी है। फिर हाउस-जॉब। फिर भी समय निकाल कर अवश्य आऊँगा।“

“ठीक है बेटे, भूलना नहीं अपनी बुआ को।“ बहुत मर्म छुपा था उनकी आवाज में, मैंने महसूस किया।

परन्तु यह बात जैसे आई-गई हो गई। अत्यधिक व्यस्तता के कारण मैं अपनी कही बात भूल गया। होस्टल में रहने के कारण वर्ष- भर बुआ से मुलाकात ही नहीं हो पाई।

फिर एक दिन मुझे अपने जीवन का सबसे बड़ा आघात लगा। जिस वार्ड में मैं हाउस-जॉब के दौरान डयूटी कर रहा था, उसे वार्ड में बुआ जी को दाखिल कराया गया। बाद में पता चला कि इसके लिये बुआ जी ने ही जिद की थी। सारे टेस्ट होने के बाद रिपोर्ट मिली कि उन्हें ब्लड कैंसर था। क्या करता? कोई निदान नहीं था। उन्हें कैसे बताता? जिसने जीवन भर मुझ ममता की बौछार की हो, उसे तिल-तिल कर मरते हुए कैसे देख पाऊँगा, समझ में नहीं आ रहा था। वरिष्ठ डॉक्टरों का कहना था कि ज्यादा से ज्यादा दो-तीन महीने ही चल पायेंगी।

एक शाम राउंड लेते हुए जब उनके पास पहुँचा तो मुझे देख कर धीरे से मुस्कराई और बोलीं-

“मुझे बताओगे नहीं बेटे मुझे क्या हुआ है?”

“कुछ भी तो नहीं बुआजी। आप जल्दी ही ठीक हो जायेंगी। फिर मैं आपके पास ही रहूँगा।“

“क्यों झूठ बोलता है माँ से?” मीठी झिड़की लगाते हुए बोली थीं वह, “मैं अब बचूँगी नहीं, मुझे मालूम है।“

“नहीं, नहीं.....” क्षीण स्वर में मैंने विरोध करना चाहा तो मेरी बात काटते हुए बोलीं –

“मैं जानती हूँ बेटे, अब बचूँगी नहीं। बस तुझे मेरा एक काम करना होगा मेरे जाने के बाद। तभी जानूँगी कि तू मुझे प्यार करता है।“

“हाँ, हाँ, बोलो न बुआ।“ अनायास ही न चाहते हुए भी मेरे मुँह से निकल गया।

अपने तकिये के नीचे से उन्होंने एक लिफ़ाफ़ा निकाला। मुझे सौंपते हुए बोलीं –

“बेटा, मेरे मरने के बाद ही इस खोलना। जिसके नाम की चिट्ठी इसमें रखी है, बस उसे ही सौंपना।

उसके ठीक तीसरे दिन बुआ चल बसीं। उनका अंतिम संस्कार करके आया तो उनकी अंतिम इच्छा का ध्यान आया। उनका दिया लिफ़ाफ़ा खोला तो उसमें से एक और लिफ़ाफ़ा निकला जो मेरे नाम था। उसमें मेरे नाम ही एक पत्र था –

“बेटे देव,

मेरी अधूरी ममता में पूर्णता लाने के लिये जो तुम्हारा कर्ज मुझ पर बाकी था, उसे चूका रही हूँ।
स्वीकार करना वर्ना मेरी शान्ति नहीं मिलेगी। मेरी इच्छा है कि तुम विदेश जाओ और खूब पढ़ो। लौट कर कैंसर हस्पताल खोल कर सेवा करना।
खर्च-निर्वाह के लिये अपनी जमा-पूँजी तुम्हारे नाम कर रही हूँ। सारे कागजात इसी लिफ़ाफे में हैं।

तुमसे जो पूर्णता मेरी ममता को मिली, उसका कर्ज उतार रही हूँ।

तुम्हारी
बुआ-माँ”

बुआ के पैसों से मैं विदेश गया। आज मेरा खूब नाम है। कैंसर रोगियों का इलाज करते हुए सोचता हूँ शायद इसी से बुआ की ममता का कर्ज उतार सकूँ। लेकिन एक बात आज तक नहीं पाया क्या बुआ ने कर्ज उतारा था या मुझ पर एक और कर्ज चढ़ा गईं थीं।


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