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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



चलो चलें


डॉ. रंजना वर्मा


 
चलो चलें वहाँ जहाँ मिले नवीन जिंदगी ।
न वैर भाव हो जहाँ खिले नवीन जिंदगी ।।

जहाँ न दूर तक कहीं दिखे नज़र झुकी हुई
वहीं  मिले  गरीब  के  गले  नवीन  जिंदगी ।। 

अगर कहीं हों' शांति के असीम फूल खिल रहे
वहीं  सुगन्ध से  भरी  झिले  नवीन  ज़िन्दगी ।।

जहाँ  नहीं  दुराव हो  नहीं कहीं तनाव हो
वहीं  किसी  प्रदेश में  पले  नवीन जिंदगी ।।

गुरूर से भरी निगाह  हो न आसमान  पर
समान भाव से जखम सिले नवीन जिंदगी ।।

न नीच ऊँच हो जहाँ खिलें सनेह क्यारियाँ
मिटा  रही   सदैव  फ़ासले  नवीन  जिंदगी ।।

जहाँ न शुभ नसीब हो न आस्था करीब हो
वहीं  नये  प्रदीप  सी  जले  नवीन  जिंदगी ।।
   

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