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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



भूल


राजेन्द्र वर्मा


 
यह हमारी भूल, हम अधरों पे ले आये व्यथा,
अब किसे अवकाश जो, सुन ले सुदामा की कथा ।
 
सिन्धु के तट बैठ मंथन-दृश्य देखा आपने,
पूछिए हमसे, कि हमने किस तरह सागर मथा !
 
आप ‘कालीदास’ से भी दो चरण आगे बढ़े,
वृक्ष ही को काट देंगे, यह कभी सोचा न था ।
 
झूठ का साम्राज्य कैसे और विस्तृत हो सके,
प्राणपण से सुन रहे वे ‘सत्यनारायण-कथा’ ।
 
लाज को भी लाज उनके सामने आने लगी,
उनके घर सदियों से लज्जाहीनता की है प्रथा ।
 

 
   

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