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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



मुमकिन नहीं


प्राण शर्मा


 
रोज़ मिलने वालों से अलगाव हो,मुमकिन नहीं 
पर सभी से एक सा बर्ताव हो , मुमकिन नहीं 

देख लीजे मार कर पत्थर भले ही दोस्तो 
आसमानों में ज़रा भी घाव हो , मुमकिन नहीं 

ज़िंदगी से  तंग पड़ते हैं कई माना मगर 
ज़हर पीने का सभी को चाव  हो,मुमकिन नहीं  

आदमी में कुछ न  कुछ बदलाव आता है मगर 
चाँद - तारों में कभी बदलाव हो,मुमकिन नहीं 

चंगे मन के बंदों में सदभाव हो , मुमकिन है पर 
मंदे मन के बंदो में सदभाव हो , मुमकिन नहीं 

हर किसीके दिल में क्या-क्या राज़ है,हम क्या कहें 
दोस्त,इस गुत्थी का कुछ सुलझाव  हो,मुमकिन नहीं 

`प्राण`आँखें मींच कर चलते रहो , चलते रहो 
सीधी - सीधी राहों में भटकाव हो , मुमकिन नहीं 
  

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