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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



रात ज़िन्दगी से बात हुई


पीताम्बर दास सराफ "रंक"


 
रात ज़िन्दगी से बात हुई
फिर वही असुंअन में बात हुई।।१।।

मैं गले से लिपट कर जो सिसका
रोते हुए दिन से बात हुई।।२।।

मैं रह रह कर टूटा इतना
जब गये गुज़रों से बात हुई।।३।।

फुटपाथ पे ही सोता रहता
जब से नियमों से बात हुई।।४।।

कोठो पर हम बाज़ार हुऐ
तब बिन कपड़ों में बात हुई।।५।।

कल भीख मिले या ना भी मिले
दिन भर ही हवा से बात हुई।।६।।

ये आंचल ग़म का सागर है
आंसू बहने से बात हुई।।७।।

इतना सब कुछ सह कर भी "रंक"
ज़ीस्त से ख़ुशी से बात हुई।।८।।
  

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