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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



लौट कर आना ही होगा


कृष्णा कुमारी “कमसिन “



शौक से जा ओ री पुरवा, तू पहाड़ी की तरफ 
लौट कर आना ही होगा , तुझ को बस्ती की तरफ 

ख़ाक खुद हो जाएगी या भाप हो जायेगा जल 	
आग से कह दो न जाये ठंडे पानी की तरफ 

पेड़ पर पत्तों के पीछे , बादलों की ओट से 
छुप के क्यूँ ताके है रे चंदा , चकोरी की तरफ 

छीन लेते हैं हमारे मुँह की अकसर बात वो 
हम ठगे से देखते रहते हैं , धरती की तरफ 

लोग बादल पर बरस पड़ते हैं , अकसर ख्वामख्वाह 
जब कि होता है इशारा सब बिजली की तरफ 

'डूबना जिस को नहीं वो ', सोचती होगी नदी 
क्यूँ चले आते हैं आखिर गहरे पानी की तरफ 

वो मेरी किस बात पर नाराज इस दर्जा हुआ 
क्यूँ नहीं आया पलट कर दिल की बस्ती की तरफ 

उस से हँस कर बात क्या कर ली कि आफत हो गई 
हर नजर के संग उछले मेरी हस्ती की तरफ 

सीपियों का दर्द सुनने के लिए बेताब सा 
कौन यह आता है 'कृष्णा” नित्य नद्दी की तरफ 

   

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