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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



क्या है


कृष्णा कुमारी “कमसिन “



क्या है जो पहुँचा नहीं बाज़ार तक
चीज कारोबार की है प्यार तक

बेटियों का घर बसाना था उसे 
बेचना आख़िर पड़ा घर बार तक

फ़ुरसतों के नाम का सरकार ने 
साल में छोड़ा नहीं इतवार तक

सारे चैनल बाँटते हैं दहशतें 
ख़ुश ख़बर पहुँचे नहीं अख़बार तक

सर उठाकर चलता है जो आदमी 
सज़दे करता है उसे संसार तक 

मुस्कुराया कोई “कमसिन” इस तरह
खिल उठे सहने – चमन में ख़ार तक
   

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