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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



तुम्हारी याद में


डा. दिनेश त्रिपाठी `शम्स’



संदली अहसास से भीगा रहा हूँ देर तक ,
मैं तुम्हारी याद में डूबा रहा हूँ देर तक ।

मैं तुम्हारे फैसले को रोक तो पाया नहीं ,
पर तुम्हें जाते हुए तकता रहा हूँ देर तक ।

कोई अपना है मनाने को मुझे बस इसलिए ,
मैं ज़रा-सी बात पर रूठा रहा हूँ देर तक ।

और क्या करता भला तन्हाइयों से ऊबकर ,
मैं स्वयं के साथ ही बैठा रहा हूँ देर तक ।

एक बाँकी दृष्टि से तुमने निहारा जब मुझे ,
जाने कितने स्वप्न मैं बुनता रहा हूँ देर तक ।

रात बिजली ऑफ़ करके मैं अकेला रूम में ,
बस ग़ज़ल जगजीत की सुनता रहा हूँ देर तक ।

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