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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



सयाने लोग


डा. दिनेश त्रिपाठी `शम्स’



जिनको हम समझाने निकले ,
वे सब लोग सयाने निकले ।

जो थे आग लगाने वाले ,
वे ही आग बुझाने निकले ।

जब भी अपने जख़्म कुरेदे ,
कितने ही अफ़साने निकले ।

हम भी मूरख सबके जैसे ,
हम ख्वाहिश को पाने निकले ।


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