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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



हौंसला दिल का जगाना चाहता हूँ!


धर्मेन्द्र अरोड़ा"मुसाफ़िर"


हौंसला दिल का जगाना चाहता हूँ!
गर्दिशों में मुस्कुराना चाहता हूँ!!

तीरगी को रौंदने का है इरादा!
बन के'जुगनू जगमगाना चाहता हूँ!!
 
बात रिश्तों की अगर हो ज़िंदगी में!
तो ख़ुशी से हार जाना चाहता हूँ!!
 
छेड़ दे जो तार सारे आज दिल के!
गीत ऐसा गुनगुनाना चाहता हूँ!!
 
ये धरा परिवार सारा मान कर मैं!
फ़ासले दिल से मिटाना चाहता हूँ!!
 
धड़कनें अब कर रही सरगोशियाँ हैं!
ज़िंदगी के सुर सजाना चाहता हूँ!!
 
अब मुसाफ़िर की तमन्ना है यही बस!
मौत से नज़रें मिलाना चाहता हूं!!
 
 
 

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