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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



रोजाना गम में मरना है


डॉ० अनिल चड्डा



यूँ ही जी कर क्या करना है,  
रोजाना गम में मरना है। 

शेखी में ही जीते हैं जो, 
अंत में मुँह के बल गिरना है।

दुविधा से तेरा होगा क्या,  
रास्ता तुझ से ही संवरना है।
 
रातों में सोयें या जागें, 
दिन होने से क्यों डरना है। 

दो शब्द ही सुन लो तुम मेरे, 
मौका खो जाना वरना है।
 

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