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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



माँ तेरा आँचल बहुत बड़ा


हर्ष कुमार सेठ


 
चंदा कि चांदनी जब धरती पर मिल जाती है
देखने में वो होती चांदनी पर माँ वह बन जाती है 
चांदनी को ओढ़े हुऐ वह आँचल अपना लहराती है 
धरती बोल उठे तब, माँ तेरा आँचल बहुत बड़ा 
माँ तेरा आँचल बहुत बड़ा

हुई बेटी तो उसके खून के प्यासे कितने लोग 
कितने लोगों के तू बार-बार समझाती है
आज बेटी है कल माँ बनेगी 
धूप में आँचल लिऐ यह भी छाव बनेगी 

जो सरहदो में शहीद हुऐ 
जो सम्भलते नही यादों और हिचकियों में 
उन्हे भी सम्भाल लेती है माँ अपने आँचल में 
माँ तेरा आँचल बहुत बड़ा

छोडकर चले जाते है दूसरे शहरों में 
अधेड़ होने पर छोड़ देते है तुम्हे अन्धेरों में 
जिनके लिए जिऐ जीवन भर रूक-रूक के 
वही छोडकर गुम हो जाते है बड़े शहरों में 
कल पिऊंगी कल पिऊंगी अपने 
मातृत्व का रस कल पिऊंगी 
मुझसे ज्यादा है जरूरत इस दुनिया को तेरी 
कल जिऊंगी कल जिऊंगी 
जी भर कर मैं कल जिऊंगी 
माँ तेरा आँचल बहुत बड़ा, माँ तेरा आँचल बहुत बड़ा

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