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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 59, अप्रैल(द्वितीय), 2019

दिशा अबोध है.....

डॉ०नवीन दवे मनावत

आज हम जिस धरातल पर खडे है कितने महफूज है? कितने अस्तित्वशाली है! रोज एक विडंबना बन जाती है । और जीवन की उलझन सुलझने से पहले नई विडंबित बात हो जाती है। आज हमारी धमनिया और सिराएं अवरूद्ध हो गई है रूक गई है उसमे धड़कने की गति विलासिता का केलोस्ट्रोल धंस गया है उसमे बेजान सी जिजीविषाओं को पाना चाहते है हम रक्त और मवाद सी विचारधारा जिससे बनाना चाहते है अभेद किला , जिसे मजबूत तो नहीं लावारिस कहा जाये! मन:स्थिति बन गई है उस मछली सी कमजोर जो क्षीण हो जाती है जलाभाव से कायरों की तरह पर कुछ मौत अप्रत्याशित उस मछली की जो बुनना चाहती है अपनी ही प्रज्ञाचक्षु से संभावनों के रक्षित जाल को खोज रहे है एक प्रलोभन का अस्तित्व अपने भीतर यत्र - तत्र पर दिशा अबोध है।


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