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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 59, अप्रैल(द्वितीय), 2019

बोल कबीरा बोल

मनोज जैन "मधुर"

● मैं पूछूँ, तू खड़ा निरुत्तर बोल कबीरा बोल ● चिंदीचोर विधायक के घर प्रतिभा भरती पानी। राजाश्रय ने बंचक को दी संज्ञा औघड़दानी। खाल मढ़ी है बाहर -बाहर हैं अंदर तक पोल। ● पाँव पटकते ही मगहर में हिल जाती क्यों काशी। सबके हिस्से का जल पीकर सत्ता है क्यों प्यासी। कथनी- करनी में क्यों अंतर है बातों में झोल। ● कब तक टपकेंगे ये आँसू पूछ रहा मैं मौला। ढुलमुल देखी मुई व्यवस्था फिर भी खून न खौला। शंख फूँक दे परिवर्तन का धरती जाये डोल।


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