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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 59, अप्रैल(द्वितीय), 2019

दो परिंदे

कनिका वर्मा एवं सचिन पुरी

दो परिंदे थे आज़ाद से, इक दूजे से टकरा गए पहले तो हैरान हुए, फिर थोड़ा घबरा गए उड़ान भरी लंबी सी दोनों ने ऊँचे आसमानों में बादलों ने भी लिख दिया नाम उनका दीवानों में देख उन्हें यूँ उड़ता तो सब तारे भी चकरा गए दो परिंदे थे आज़ाद से, इक दूजे से टकरा गए उड़ना दोनों चाहते थे बिना किसी सीमाओं के जीना चाहते थे साथ बिना रिश्तों के नामों के देख उन्हें आज़ाद और साथ, लोग सारे हड़बड़ा गए दो परिंदे थे आज़ाद से, इक दूजे में गहरा गए ज़माने ने किया शिकार उनमें से एक परिंदे का घर छीन लिया हवाओं के आवारा बाशिंदे का टूट के हुए चूर, सपने सारे उनके खतरा गए दो परिंदे थे आज़ाद से, अब जैसे अधमरा गए पर-कटे परिंदे की आज़ादी से अब क्या खतरा हँसे ये लोग, घोट के उसके जोश का कतरा-कतरा छूटा यार और छूटा प्यार, देश-घर बिखरा गए दो परिंदे थे आज़ाद से, अब जैसे थरथरा गए ये ज़माना क्या जोश-ए-मस्ती को समझ पाएगा जिसने चख ली हो नशा-ए-आज़ादी, वो तो गाएगा रूह ना कभी कैद हो पाई, पंख चाहे फड़फड़ा गए दो परिंदे थे आज़ाद से, मंद-मंद मुस्कुरा गए


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