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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

वो लड़की#ओवुमनिया

पूजा वर्मा

वो लड़की अरमानो के साथ, आंखों मैं सपने लिए, नये जीवन की उम्मीदों के साथ, चल पड़ी उस अनजान घर मे, थाम के अपने पिया का हाथ। जाते ही सबका खूब लाड प्यार मिला, बड़े हो या छोटे सबसे ही सम्मान मिला, बूढ़ो ने आशीर्वाद ओर सगे साथी सबने उसका साथ दिया। हसी खुशी के माहौल मे, उसने कई दिन गुजर दिये। ये हँसी लम्हे अब यु ही बीतने लगे, वो पुराने ओर हसी के किस्से कम होने लगे। आंखों के सपने ओर दिल के अरमान, अब आंसुओ मैं धुलने लगे। छोटी छोटी बातों पर, उसको भी ताने मिलने लगे। माँ-बाप ने कुछ नही सिखाया? यही फसाने बनने लगे। नए रीति रिवाजों के संग, वो भी सबसे दबने लगे, छोटी सी गलती पर फिर , थप्पड़ भी वो खाने लगे। नई चूड़ियाँ मांगने पर, उसके घर फ़ोन जाने लगे। इच्छाएं पूरी करो इसकी, या भेज दो कुछ आमदनी। इन्ही बातों के साथ, घरवालो को उसके, वो सताने लगे। दहेज न देने पर उसको, उनकी गालियां ओर ताने मिलने लगे। सासु ने भी हाथ उठाया, ओर पिया भी डंडे बरसने लगे। रोती हुई आंखों से वो, दर्द से चिल्लाने लगे। वो मरहम भी न देते थे, उन्ही घावों पर वो रोज नए घाव देने लगे। नए जीवन के सारे अरमान, अब जख्मो मैं बदलने लगे। मायके का प्यार उसका, ससुराल की प्रताड़नाओं मैं बदलने लगे। दहेज के लोभियों से, वो दूर जाने की सोचने लगे। रात को बंद कमरे मे, सज संवर कर वो दुल्हन की तरह, अपने अरमानो को याद करने लगे। लेकर जहर की शीशी वो, दूध मैं मिलाकर पीने लगे। इस नरक भरे जीवन से , वो दूर गगन मैं जाने लगे। छोड़ कर ये रीति रिवाज, वो अब खुशी खुशी से, चैन की नींद ले, सपनो की दुनिया मे जाने लगे। छोड़ कर दहेज के लोभियों को वो यु इस तरह कह कर गए। बहुओ को न तोलो धन से न ही सोने चांदी से। बेटी ही वो भी किसी की रखो उसे भी रखवाली से।


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