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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



हिंदी की सोच


सुशील शर्मा


 
हिंदी दिवस 
सुना सुनाया सा नाम लगता है। 
अच्छा आज हम हिंदी पर 
हिंगलिश में बात करेंगें। 
आज हम कहेंगे 
हिंदी में बात करना चाहिए। 
हिंदी खतरे में है। 
सरकारें सो रही हैं। 
आज हम चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे। 
हिंदी राष्ट्र भाषा है 
हमें इसका सम्मान करना चाहिए।
और फिर हम चल पड़ेंगे 
कान्वेंट स्कूल अपने बच्चे को लेने। 
हम भाषण देंगे 
हिंदी की अस्मिता को बचाना है। 
फिर 'सॉरी ' हेलो, हाय, बेबी,  
शब्दों से उघड़ाते हैं उसका बदन। 
बाज़ारीकरण के इस असभ्य दौर में। 
अंग्रेजी एक चमचमाता "मॉल" है। 
जिसमें सब मिलता है। 
जॉब्स  से लेकर जिप तक 
और हिंदी एक परचून की दुकान 
जो हमारी आत्मा तो तृप्त करती है। 
पर पेट का पोषण नहीं  
भारतीयता तो मिल सकती है। 
किन्तु वरीयता नहीं। 
हिंदी उस देव के समान बन गई है। 
जिसको पूज कर लोग 
उसी के सामने अश्लील नृत्य करते हैं। 
संसद से लेकर सड़क तक। 
सब हिंदी का गुणगान करते हैं। 
लेकिन व्यवहार में अंग्रेजी अपनाते हैं। 
तारीफ पत्नी की करते हैं 
और "दूसरी" के साथ समय गुजारते हैं। 
बंद दरवाजे का शौच 
और हिंदी की सोच 
अपनाने की आवश्यकता है।

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