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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



चुहियाधिकार आयोग


महेश द्विवेदी


जब मैं छोटा था तब मेरे गांव के खेतों में इतनी कम पैदावार होती थी कि गांव के आधे लोग आधा पेट खाकर और आधा पेट हरीनाम जपकर सो जाया करते थे. सूखा, बाढ़ आदि दैवी प्रकोपों के दिनो में उन लोगों द्वारा यदा-कदा पूरा पेट भी हरीनाम से ही भरा जाता था. ऐसे लोगों को खाली पेट सोने का अभ्यास कराने के लिये ज़मीदारों ने बेगारी लेने की बड़ी कारगर एवँ युक्तिसंगत प्रथा भी चला रखी थी. बेगारी लेने के दौरान ज़मीदारों के कारिंदे उन लोगों पर इतनी दया अवश्य करते थे कि लात-घूंसो से उनकी इतनी पिटाई कर देते थे, कि उन्हें सोते समय हरीनाम के अतिरिक्त रोटी-दाल जैसी तुच्छ चीज़ों की याद ही न आये.

पर समय बदलता है और बदला भी. एक दिन मैंने यह समाचार पढ़ा कि वैज्ञानिकों ने गेहूं, गन्ना, धान आदि के जीन्स बदलकर उनकी पैदावार को बढ़ा दिया है. मुझे यह समाचार पढ़कर प्रसन्नता हुई थी क्योंकि हरीनाम सुनने से मेरे मन में पीड़ा होती थी और उस स्थिति को बदलने में अपनी असमर्थता पर खीझ भी उठती थी. नये बीजों के आने से खेती की पैदावार मेरे गांव में भी बढ़ी थी और हरीनाम मात्र से पेट भरकर सोने वालों की संख्या में कमी आई थी. फिर कुछ वर्ष बाद यह समाचार छपा कि वैज्ञानिकों ने गाय-भैंस जैसे जानवरों के जींस में परिवर्तन कर उनकी उत्पादकता बढ़ा दी है और अब मानव के जींस में भी परिवर्तन का प्रयत्न कर रहे हैं. यह पढ़कर पहले तो मेरी खोपड़ी में यह खटका पैदा हुआ था कि आदमी अभी कौन कम पैदावार कर रहा है, जो उसके जींस से छेड़छाड़ कर उसकी पैदावार बढ़ाई जाये. पर धीरे धीरे जब यह पता चला कि यह जीन-परिवर्तन आदमियों के रोगग्रस्त अंगों का प्रत्यारोपण कर उन्हें निरोग करने और उनकी आयु वृद्धि हेतु किये जा रहे हैं, तब मेरे मन को शांति की प्राप्ति हुई थी. परंतु ‘शांति’ कभी किसी के यहां स्थायी होकर कहां रही है. मेरे मानस से भी शीघ्र ही किनारा कर गई, जब खबर पढ़ने को मिली कि स्वीडेन के वैज्ञानिकों ने चूहे के दिल को निकालकर उसमें आदमी की कोशिकाओं का प्रवेश कर दिया और फिर उस दिल को जीवित रखकर उसके विकास हेतु आवश्यक पोषक पदार्थ देते रहे. इससे कुछ समय पश्चात वह दिल आदमी के दिल के समान हो गया है, जिसे किसी आदमी के रोगग्रस्त को दिल निकाल कर उसके स्थान पर प्रत्यारोपित किया जा सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अब हृदय-प्रत्यारोपण आसान हो जायेगा. रोगियों को किसी व्यक्ति की दुर्घटनाजनक मृत्यु से प्राप्त होने वाले दिल की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी.

इस सफलता से वैज्ञानिक बहुत उल्लसित हैं, परंतु मेरा शेखचिल्ली-मन उस दिन से चकरघिन्नी बना हुआ है और मुझे तरह-तरह के डरावने सपने आने लगे हैं. मुझे आशंका है कि अब आदमी का क्या होगा. अभी तक तो वह बीवी को छोड़कर हर किसी के सामने अपने को शेर साबित करता था. बस बीवी के सामने अवश्य चूहा बना रहता था. प्रत्यारोपण में चूहे का दिल प्राप्त करने वाला आदमी तो हर चुहिया के सामने थरथर कांपेगा. चूहा-चुहियों में विवाह एवं एकपत्नीव्रत की परम्परा तो है नहीं, जो वह थरथर कांपने के मामले में अपनी चुहिया और दूसरी चुहियों में अंतर कर सके. यह सोचकर मुझे तो झुरझुरी आती है कि थरथर कांपते समय यदि उसकी मूंछें भी चूहे की मूंछों की तरह ऊपर-नीचे हिलने लगीं, तो चुहिया इसे अपने पर ‘चैलेंज’ समझ कर उन मूंछों को कुतर ही न दे.

पर हर काले बादल के पीछे एक रजत-रेखा छिपी रहती है. आदमियों का दिल प्रत्यारोपण के फलस्वरूप चूहा-छाप हो जाने से एक बड़ा लाभ होगा. महिलाओं से छेड़छाड़ और उन पर बलात्कार की घटनायें कम हो जायेंगी और किसी मुख्यमंत्री को ऐंटी-रोमियो स्क्वाड बनाने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी. महिलायें निरापद रहकर दिन-रात कहीं भी आ-जा सकेंगी. पर मेरे मन में फिर एक नवीन आशंका के बादल छाने लगे हैं : बिचारी चुहियों का क्या होगा? वे इन चूहा-हृदय आदमियों से कैसे बच पायेंगी? क्या अभी तक महिलाओं पर आने वाली आफ़त चुहियों पर कहर बनकर नहीं टूट पड़ेगी? मेरा सुविचारित मत है कि शासन को इस विषय में अभी से सतर्कता बरतनी चाहिये और शीघ्र ही ‘चुहियाधिकार आयोग’ की स्थापना करनी चाहिये. पुलिस विभाग को ‘चुहिया हेल्पलाइन’ का गठन कर उसके फोन नम्बर की मुनादी चुहियों के बिलों में करा देनी चाहिये.

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