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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



बालमन


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


"इलाहाबाद की झांकियों के बारे में तो बहुत कुछ सुन रखा है | पिता जी क्या हम सब भी चले आपके साथ |" बड़ी बहू ने पूछा

"दादू मैं भी चलूँगा |" अंकित मचल उठा |

मेले में मस्ती करते हुए गुजरती झाँकियो के बारे में दादू से पूछता रहा " ये कौन, ये कौन? दादू बताओ न |"

माँ ने एक बार डाँटते हुए कहा - " दादा जी को परेशान नहीं करते बेटा | यह लो चुपचाप आइसक्रीम खाओ।"

तुरंत दादा जी ने कहा - "कोई बात नहीं बहू | मैं परेशान नहीं हो रहा हूँ, बल्कि खुश हूँ कि इसे रूचि है "रामायण" में |"

तभी छोटे से हनुमान और बड़े से राम का स्वरूप देखकर अंकित आश्चर्य से देखता रहा। इस बात से बेफिक्र कि उसकी आइसक्रीम पिघल रही है।

जैसे ही अंकित के बहुत नजदीक से हनुमान गुजरे, उसे आइसक्रीम खाते देख उनका खुद का मन भी मचल उठा।

लेकिन तभी उन्हें आयोजक की बात याद आयी, 'बिना हिलेडुले यदि पूरा रास्ता तय कर लिया तो ढेर सारी आइसक्रीम और चॉकलेट मिलेगी' 'आइसक्रीम..वाव यम्मी ....' तिरक्षी नज़र से अंकित को देखकर जीभ फिरा दी उन्होंने ओठों पे | जैसे कि अंकित की पिघलती हुई आइसक्रीम का स्वाद हनुमान के ओठों पर भी आ गया हो |

फिर अंकित बोला -

" दादू , आप तो कहें थे, हनुमान ने राम और लक्ष्मण दोनों ही को अपने कंधे पर बैठाया था ! पर इतने छोटे से हनुमान कैसे उठा पाएंगे |"

बिना जवाब का इन्तजार किये आगे बोला- "मम्मी तो मुझे डांटती हैं जब मैं अपनी बहन को उठाना चाहता हूँ | कहती हैं गिरा देगा उसे | पालने में ही खेल उससे |"

"ठीक ही तो कहती है तुम्हारी मम्मी।"

"फिर इन्हें नहीं डांट पड़ी राम की मम्मी से!"

यह सुनकर अब आश्चर्य से मुहँ खुला रह जाने की बारी माँ और दादा जी की थी।

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