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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



काश मेरी भी एक बहिन होती।


सुशील शर्मा


 		 
काश मेरी भी एक बहन होती
रोती हँसती और गुनगुनाती 
रूठती ऐंठती खिलखिलाती।
मुझ से अपनी हर जिद मनवाती।
राखी बांध मुझे वो खुश होती
काश मेरी भी एक बहन होती।

घोड़ा बनता पीठ पर बैठाता।
उसको बाग बगीचा घुमाता।
लोरी गा गा कर उसे सुलाता।
मेरी बाहों के झूले में वो सोती
काश मेरी भी एक बहन होती।

सपनों के आकाश में उड़ती
सीधे दिल से वो आ जुड़ती
रिश्तों को परिभाषित करती
होती वो हम सबका मोती।
काश मेरी भी एक बहन होती।

कभी दोस्त बन मन को भाँती
कभी मातृवत वो बन जाती
कभी पुत्री बन खुशियां लाती।
जीवन की वो ज्योति होती।
काश मेरी भी एक बहिन होती।

रक्षाबंधन के दिन आती
मेरे माथे पर टीका लगाती
स्नेह सूत्र कलाई पर सजाती
आयु समृद्धि का वो वर देती।
काश मेरी भी एक बहिन होती।
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