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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



निमंत्रण


सुशांत सुप्रिय


 		 
ओ प्रिय
आओ कोई ऐसी जगह तलाश करें
जहाँ प्रतिदिन मूक समझौतों के सायनाइड
नहीं लेने पड़ें
जहाँ ढलती उम्र के साथ
निरंतर चश्मे का नंबर न बढ़े
जहाँ एक दिन अचानक
यह भुतैला विचार नहीं सताए
कि हम सब महज़
चाबी भरे खिलौने हैं

चलो प्रिय
कौमा और पूर्ण-विराम से परे कहीं
जिएँ
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