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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



बादल गरजता है


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


 
बादल जब जब गरजता है,
मेरे दिमाग में खटकता है!!
मुझे लगता है,
धमकाता है यह धरती को,
अपनी औकात बतलाता है,
इस विशाल धरती को
एक धीमी सी गर्जना से
थर्रा देना चाहता है !!

बादल नहीं जानता कि धरती,
धीमी सी गर्जना से नहीं थर्रायेगी,
बादल कितना भी बौखलाए
कितनी भी बिजलियाँ गिराए,
पर नहीं तोड़ पायेगा वह धरती को।

गिराता है बिजली!
हिमशिला गिराता है!!
कुछ लकीरें अवश्य पड़ती हैं,
पर यह धरती उसे
स्वयं में छिपा लेती है,
अपने को टूटने से बचा लेती है।

बादल फिर आँसू बहाने लगता है,
उसी को लोग बरसात कहते है!!
पर लोग क्या जानें कि
यह बरसात नहीं !
बल्कि बादल का रोना है
अपनी हार पर।

धरती उसके आँसुओं को
अपने में समेट लेती है,
फिर उन्हीं आँसुओं से
बादल का पेट भरती है।

यही चक्र हर बार चलता है,
बादल अपना कर्म करता है,
धरती अपना कर्म करती है,
बादल गरजता है!!
मेरे दिमाग में खटकता है,
शायद धमकाता है धरती को
अपनी औकात बतलाता है।।

और धरती हर बार सोचती है,
क्षमा बड़न को चाहिए
छोटन को उत्पात।।
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