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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



चार कांधों की दरकार


संजय वर्मा "दृष्टी "


 		 
सांसों के मध्य संवेदना का सेतु 
ढहते हुए देखा 
देखा जब मेरी सांसे है जीवित 
क्या मृत होने पर 
सवेंदनाओं की उम्र कम हो जाती
या कम होती चली जाती 
भागदोड़ भरी जिंदगी में 
वर्तमान हालातों को देखते हुए लगता है 
शायद किसी के पास वक्त नहीं 
किसी को कांधा  देने के लिए 
समस्याओं का रोना लोग बताने लगे  
और पीड़ित के मध्य अपनी भी राग अलापने लगे 
पहले चार कांधे लगते 
कही किसी को अब अकेले ही उठाते देखा ,
रुंधे कंठ को 
बेजान होते देखा खुली आँखों ने 
संवेदनाओं को शुन्य होते देखा 
संवेदनाओ को गुम होते देखा 
ह्रदय को छलनी होते देखा 
सवाल उठने लगे 
मानवता  क्या मानवता नहीं रही
या फिर संवेदनाओं को स्वार्थ खा गया 
लोगों की बची जीवित सांसे अंतिम पड़ाव से 
अब घबराने लगी 
बिना चार कांधों के न मिलने से अभी से 
जबकि लंबी उम्र के लिए कई सांसे शेष है 
ईश्वर से क्या वरदान मांगना चाहिए ?
बिना चार कांधों के हालातों से  कलयुग में 
अमरता का वरदान मिलना ही चाहिए
ताकि हालातों को बद्तर होने से बचाया जा सके 

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