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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



पथरीला पथ है तो क्या


गौतम कुमार सागर


पथरीला पथ है तो क्या
हिम्मत भी फौलादी है

अड़ियल है भाग्य मेरा
तो इरादे भी जिद्दी हैं

दु:ख की मरूभूमि मन में
हर्ष का निर्झर भी मन में
एक शैतान मन के भीतर
है एक ईश्वर भी मन में

मन को मुट्ठी में कर लो
सारी दुनिया मुट्ठी में
जीवन व्यर्थ बीत न जाये
सांसों की हवा कबड्डी में

ऐरे गैरों को नहीं मिलती
सफलता एक शहजादी है
पथरीला पथ है तो क्या
हिम्मत भी फौलादी है

पंचामृत बन जाता है
पूजा की थाली में बूँद
कितना घातक हो जाता
सर्प की विष-थैली में बूँद

नियति के कारे मेघों में
जीवन है ऐसा  कतरा 
कहीं है विष की संभावना
कहीं नाली में गिरने का खतरा

कुदरत पूरी करती मन्नत 
जो सच्चा फरियादी है
पथरीला पथ है तो क्या
हिम्मत भी फौलादी है
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