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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



सुनो अबोले


डॉ आरती कुमारी


 		 
तुम्हारे पास मुझसे कहने को 
कभी कुछ क्यूं नही होता 
कहां से सीख लिया है तुमने
परत दर परत दर्द को
अपने दिल के तहखाने में छुपाना
बिना किसी को नाउम्मीद किये
चुपचाप अथक परिश्रम से
सबकी ख्वाहिशों को पूरी करना
न जाने 
अपने सपनों के कितनी ही कश्तियों को
डुबो दिया है तुमने
अपनी गहरी नीली आंखों के समंदर में
और स्वयं चप्पू बन 
समस्याओं के अनंत तूफानों से जूझते
पार लगा दिया है
अपने आसपास के लोगों को!
क्यूं तुम
दूसरों के दुख दर्द से व्यथित हो
अक्सर चुपचाप 
कर जाते हो पलायन
मुझे अनकहा अनसुलझा छोड़कर
एक बुद्ध की भांति...
अपनी पीड़ा के रेगिस्तान में 
क्यों नही खिलने देते 
जिजीविषा के फूल
सुनो अबोले...मैं
तुम्हारे अंतर्मन की गहराइयों में उतर
स्थिर तलहटी से 
चुनना चाहती हूं 
तुम्हारे अनमोल शब्दों के मोती
सुनना चाहती हूं तुम्हारा अंतर्नाद
लाना चाहती हूं तुम्हारे भीतर 
उत्साह का ज्वार
प्यार की सुनामी...
बनना चाहती हूं तुम्हारे लिए 
सुर लय ताल में थिरकता संगीत
चुराना चाहती हूं 
खुशियों के जुगनुओं को
और चाहती हूं करना
तुम्हारे बेनूर होते चेहरे को रौशन
भरना चाहती हूं
तुम्हारे कोरे कैनवास सी ज़िन्दगी को
आशाओं के अनगिनत रंगों से
और समेटना चाहती हूं अपने आँचल में
तुम्हारी तमाम उदासियों और नाकामयाबियों को 
सुनो...
क्या तुम.. 
दोगे मुझे ...
एक मौका...??
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