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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



बचा लेना होगा खुद को मरने से


डॉ आरती कुमारी


 		 
आज नही मर रहा है केवल एक इंसान 
न ही मर रहे हैं सिर्फ बूढ़े लाचार शरीर
पर आज..
मर रही हैं उम्मीद के झिलमिलाते दीप लिये 
चौखट पे जमी मां की आंखें
जो अपने बेटे के इंतेज़ार में पथरा सी गईं हैं
आज मर रही है माँ की ममता 
मर रही है उसकी थपकी देतीं लोरियां, 
सूख रहा है उसके आँचल का दूध
जब उसके बच्चे दूर परदेस जाकर
उसकी आवाज़ तक को सुनने से
कर देते हैं इनकार
और झटक देते हैं एक सिरे से 
उसके कंपकंपाते हाथों को 
जो तलाशते रहते हैं
अपने बच्चो में अपने बुढ़ापे की लाठियां..
आज मर रहा है एक पिता का धैर्य 
और उसका त्याग 
मर रहा है उसका आत्मविश्वास
जब उसके ही पुत्र लगा देते हैं 
उसके पूरे वजूद पर एक सवालिया निशान 
और देते हैं एक करारा तमाचा
उसके द्वारा दी गई परवरिश को...
आज का युवा कर रहा है प्रतिनिधित्व
उस पाश्चात्य संस्कृति का 
जिसमें हमारे घर में बुजुर्गों के लिए 
कोई एक कोना भी मयस्सर नही होता
जिस महानगरीय व्यवस्था और
मशीनी ज़िन्दगी में बोझ समझ 
छोड़ दिया जाता है बेबस मां बाप को
ओल्ड ऐज होम में 
घुट घुट के अंतिम सांसे गिनने को 
आज मानवीय संवेदनाओं को मार 
चमकता खनखनाता कलयुगी सिक्का
कर रहा है 
उन सारे मूल्यों और संस्कारों पर राज
जो हमारे भरत वंश की परंपरा रही है
जिस संस्कृति में 
ययाति, श्रवण और राम सरीखे पुत्र हुए 
जिस संस्कृति में 
बुजुर्गों की सेवा करना
 हमारा सिर्फ कर्तव्य ही नहीं 
बल्कि जिनके चरण 
देवी देवताओं के चारों धाम तुल्य माने गए 
आज मर रही है ..बेमौत.. वही संस्कृति
आज अपनी ही लाश ढो रही है हमारी सभ्यता
अब भी वक़्त है ..बचा लेना होगा हमें
इन मरती आत्माओं को
इन लहूलुहान होते पारिवारिक संबंधों को
बचा लेना होगा इन टूटते मानवीय रिश्तों को
बचा लेना होगा अपनी खत्म होती भारतीय संस्कृति को
और बचा लेना होगा गर्त में जाते अपने खुद के भविष्य को.. !!
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