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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



बेटियां


आनंद कुमार


 		 
घर में खुलती हैं ख़ुशी की खिड़कियाँ 
जब-जब दुनिया में आती हैं बेटियां।

तितलियाँ सी मंडराती हैं यहाँ-वहाँ
जब चलने लग जाती हैं बेटियां।

बढ़ जाती है आँगन में चिड़ियों की चहक 
जब बोलने लग जाती हैं बेटियां।

खोलती हैं सवालों के पिटारे 
जब पढ़नें लग जाती हैं बेटियां।

गर्व से फूल जाता है सीना 
जब नाम कमाती हैं बेटियां।

आईना भी शरमा जाता है 
जब आईनें के सामने आती हैं बेटियां। 

चिंता में डूबे रहते हैं माँ-बाप 
जब सयानी हो जाती हैं बेटियां।

रोके नहीं रूकते आँखों के आँसू
जब पराए घर जाती हैं बेटियां।

जब माँ-बाप से सब मुंह मोड़ लेते हैं 
तब-तब फर्ज निभाती हैं बेटियां।

जब आती है मुसीबत भाई पर 
सामने खड़ी हो जाती हैं बेटियां।

मालूम न हो जो माँ की ममता 
ये वो है जो हर रिश्ते पे लुटाती हैं बेटियां।

क्या होती है सौम्यता, नाजुकता और दृढ़ता 
देखो तो हर किरदार में दिखाती हैं बेटियां।

जो न जानता हो प्रेम की परिभाषा 
सीखो तो सिखाती हैं बेटियां।

जिंदगी में आती हैं नई सुबह की तरह 
झोंके सी चली जाती हैं बेटियां।
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