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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



गीत -
रात ने ओढ़ी काली चादर


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
रात ने ओढ़ी काली चादर,
दिन भी सूना-सूना है। 
दर्द यहाँ पर मुफ्त में मिलते, 
सुख का मोल तो दूना है।।

खुद में खोया हर बाशिंदा,
साये से भी दूर हुआ, 
कोई यहाँ पानी को तरसे,
कोई नशे में चूर हुआ, 
हँसी-ख़ुशी कट जायें दो दिन,
चार दिनों का रोना है।
दर्द यहाँ पर मुफ्त में मिलते,
सुख का मोल तो दूना है।।

मौत के सौदागर सबसे यहाँ पर,
हँस-हँस कर ही अब मिलते हैं, 
फाड़ के खुद ही सबकी चादर,
पैबन्दों से सिलते हैं, 
दोस्त के वेश में दुश्मन मिलते, 
पीतल वेश में सोना है।
दर्द यहाँ पर मुफ्त में मिलते,
सुख का मोल तो दूना है।।
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