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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



सरहदें


सुशील शर्मा


 		 
कई सरहदें बनी लोग बँटते गए।
हम अपनों ही अपनों से कटते गए।

उस तरफ कुछ हिस्से थे मेरे मगर।
कुछ अजनबी से वो सिमटते गए।

दर्द बढ़ता गया दूरियां भी बढ़ी।
सारे रिश्ते बस यूं ही बिगड़ते गए।

दर्द अपनों ने कुछ इस तरह का दिया।
वो हँसता रहा मेरे सिर कटते गए।

खून बिखरा हुआ है सरहदों पर मगर।
वो भी लड़ते गए हम भी लड़ते गए।

एक जमीन टुकड़ों में बंटती गई।
हम खामोशी से सब कुछ सहते गए।

सरहदों की रेखाएं खिंचती गईं।
देश बनते रहे रिश्ते मिटते गए।
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