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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



ग़ज़ल -
उड़ते हैं हज़ारो आकाश में पंछी


प्राण शर्मा


उड़ते हैं हज़ारो आकाश में पंछी 
ऊँची नहीं होती परवाज़ सभी की 

उन दोनों की नीयत ऐ दोस्त थी खोटी 
उन दोनों की यारी कैसे भला निभती 

सूखी ज़रा होती जल जाती वो शायद 
कैसे भला जलती जल से भरी तीली 

होना था असर कुछ इस शहर भी उनका 
ये माना कि आँधी उस शहर चली थी 

इक डूबता बच्चा कैसे वो बचाता 
उस शख़्स में प्यारे हिम्मत की कमी थी 

कुछ  शोर सुना तो डर कर सभी भागे 
कुछ मेघ थे गरजे बस बात थी इतनी 

तू दोस्त है  मेरा  कभी पूछता आ कर 
क्या हाल है मेरा क्या चाल है मेरी 

पुरज़ोर हवा में गिरना ही था उसको 
ऐ ` प्राण ` घरों की दीवारें थीं कच्ची 
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