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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



ग़ज़ल-
भ्रम मनों में पाले बैठे हैं


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
भ्रम मनों में पाले बैठे हैं,
जग जैसे सँभाले  बैठे हैं।

हर चीज नहीं तेरे बस में,
बड़े और निराले बैठे हैं।

कोई बात नहीं सुनते हैं वो
तलवार निकाले बैठे हैं।

मेरा प्यार कहाँ अब पूछें वो,
बहुत  दिलवाले बैठे हैं।

नहीं ‘अनिल’ है सीधा सा,
सब देखे भाले बैठे हैं।
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