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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



दोहे


अशोक बाबू माहौर


 
कागज नाव बनाय के, पानी दई बहाय 
फुदकत जात खूब बहे, पल पल रही नहाय।

चढ़ती धूप मुडेर पर, आँगन हँसता जाय 
सुबह हुई उठो बिटिया, जगा रही है माय। 
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