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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



गगरिया पनघट पे फूटी


हरिहर झा


 
फिसलती जाती उंगली टहनियों से  
लटका दिये हैं पाँव लबड़-धोंधों से। 

कंस के भांजे बने लूटत रहे  हैं सैकडों को 
कान्ह  को बस छोड़, ग्वाले छेड़ते है गोपियों को 
गगरिया पनघट पे फूटी बरसों से। 

पराई,  नार पर  राम-रहिम, स्वाँगमय नज़र तिरछी    
आश्रम बनाया छिपाते , गन कही  चाकू-बरछी   
 पीता रहा खून ,  दीमक  हजारों से। 

बेटी न हो, जुगाड़ करके  बेटा अरे! बना दिया 
थी रात काली भयानक ,  करतब ने मुँह बन्द किया 
शव सच का क्यों, उठवा दिया झूठों से। 

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