Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



हिन्दी कहानी में पासपोर्ट वीज़ा से संबन्धित समस्याएँ
(प्रवासी महिला कहानिकारों के संदर्भ में)


डॉ. मधु संधु


अंतर्राष्ट्रीय यात्रा या प्रवास के लिए पासपोर्ट या पारपत्र व्यक्ति विशेष के पहचान पत्र का काम करता है। यह राष्ट्रीय सरकार द्वारा जारी ऐसा दस्तावेज़ है, जो धारक के नाम, जन्मतिथि, लिंग, जन्मस्थान, चित्र आदि को सहेजे, उसकी राष्ट्रीयता को प्रमाणित करता है। लेकिन विदेश जाने के लिए उसे वीज़ा की आवश्यकता होती है। वीज़ा ही व्यक्ति को जारी करने वाले देश में प्रवेश की अनुमति देता है। वीज़ा अलग दस्तावेज़ भी होता है और पासपोर्ट पर एक मोहर के रूप में भी पृष्ठांकित किया जाता है। माना गया है कि अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के संदर्भ में ऐसे दस्तावेजों की आवश्यकता मुख्यत: प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात पड़ी। दूसरे देशों में जाने के उद्देश्य और वहाँ रुकने की अवधि के परिप्रेक्ष्य में वीज़ा कई प्रकार का होता है- ट्रांज़िट वीज़ा, टूरिस्ट वीज़ा, बिजनेस वीज़ा, ऑन-अराइवल वीज़ा, स्टूडेंट वीज़ा, वर्किंग होलिडे वीज़ा, डिप्लोमैटिक वीज़ा, जर्नलिस्ट वीज़ा, मैरिज वीज़ा वगैरह वगैरह। कुछ देशों में ऐसी पारस्परिक संधियाँ भी चल रही हैं कि नागरिकों को चुनींदा देशों में जाने के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं पड़ती। यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों के नागरिक एक- दूसरे देश में बिना वीज़ा के आ-जा सकते हैं। अमेरिका और गल्फ भी कुछ देशों को ऐसी छूट देते हैं। नेपाल- भूटान के लोग भारत में भी बिना वीज़ा के प्रवेश कर सकते हैं। सऊदी अरब, कतर, क्यूबा, उजबेगिस्तान आदि में देश छोड़ने से पहले एक्जिट वीज़ा भी बनवाना पड़ता है।

कहानी मे पासपोर्ट वीज़ा के मुद्दे बीसवीं शती के सातवें दशक से लेकर आज तक यानी 21वीं शती के दूसरे दशक तक गंभीर समस्या के रूप में उभरे हैं, जबकि इसी बीच भारत और दूसरे देशों की नीतिओं में अनेक परिवर्तन भी हुये हैं। यह समस्याएँ एक जंग की तरह हैं। दूसरे देशों मे जाकर व्यक्ति कितना असहाय, बेबस, बेचारा, बौना हो जाता है, अपने और पराये देश के लोग उसे कैसे- कैसे दबाते- झंझोड़ते- निचोड़ते हैं- प्रवासी महिला कहानीकारों ने इसके अनेक चित्र अपनी कहानियों में रेखांकित किये हैं।

विदेश जाने के लिए, वहाँ रहने के लिए, वहाँ से लौटने के लिए पासपोर्ट और वीज़ा पाने के लिए सबसे पहले पैसे का जुगाड़ करना पड़ता है। आज से लगभग पचपन वर्ष पहले उषा प्रियम्वदा ने अपनी ‘मछलियाँ’ कहानी में पाठक को इस सच्चाई से रू-ब-रू करवाया था। ‘मछलियाँ’ में विजय लक्ष्मी यानी विजी सौतेली माँ और घर के लोगों से झगड़ा करके, नानी के दिये सारे गहने बेच कर अपने मंगेतर मनीश के लगातार आ रहे पत्रो के कारण उसके लिए भारत से अमेरिका आती है और हवाई अड्डे पर पहुँच पता चलता है कि वह तो मैक्सिको गया हुआ है। जब पता चलता है कि जिस मनीश के लिए वह सब कुछ दांव पर लगाकर अमेरिका आई है, वह मुकी को चाहता है तो पराए देश में उसकी स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। अब क्या करे, धनाभाव और हठ करके अमेरिका आने के कारण न वह भारत लौट सकती है और न वहाँ कोई अपना है। वह लाइबरेरी में काम करके जैसे- तैसे जीविका जुटाने लगती है। गरीबी इतनी है कि रोज एक ही नीले फूलों वाली साड़ी पहननी पड़ती है और भारत आने के लिए नटराजन से 1500 डॉलर मांगने पड़ते है।

एक ओर पासपोर्ट- वीज़ा के नियम- कानून और दूसरी ओर विदेश भेजने का धंधा करने वालों के हेर फेर- दोनों ने मिलकर आम आदमी का जीना दुश्वार कर रखा है। अर्चना पेन्यूली की ‘एन. आर. आई.’ में एक एन. आर. आई. का जीवन संघर्ष है। भाई की शादी पर उसका साला मनजीत अमेरिका से आता है और दलाली के काम से उकताया दर्शनलाल उससे विदेश बुलाने का आग्रह करने लगता है। आठ लाख रूपये देकर दर्शनलाल इल्लीगल इममिग्रेंट के रूप में पानी के जहाज से अपनी विदेश यात्रा शुरू करता है और डेढ़ महीने बाद पता चलता है कि वह अमेरिका नहीं डेन्मार्क रिफ़्यूजी के रूप में रेडक्रास की तरफ से जम्मू के आतंकवाद और असुरक्षित जीवन के हवाले से जा रहा है। वहाँ वह सफाई कर्मचारी के रूप में जीवन शुरू करता है और फिर मोनिर के साथ मिल अपना ग्रिल यानि ढाबा/ होटल खोलता है। तीन साल बाद तीन हफ्ते के लिए भारत आता है, सोनिका से शादी कर उसे जल्दी बुलाने का आश्वासन दे लौट जाता है। डेनमार्क पहुँचकर पता चलता है कि वह शरणार्थी की हैसियत से वहाँ और नहीं रह सकता। भारत से पैसे के बल पर आतंकवादी होने के दस्तावेज़ बनवा फ़्रांस में आ ऐफ़िल टावर के पास खिलौने बेचने लगता है और फिर बैरे का काम मिल जाता है।

सुधा ओम ढींगरा की ‘फंदा क्यों’ में ग्रीन कार्ड की समस्या है। ग्रीन कार्ड के लिए लोग फर्जी शादियाँ करते रहते हैं और बहुत से स्थानीय लोगों ने फर्जी शादियों का धंधा अपनाया हुआ है। मोहन बख्शिन्दर के साथ पिता से चोरी गाँव छोड़ बिशनसिंह दोसांझ के खेतों में काम करने अमेरिका तो आ गया, लेकिन समस्या वीज़ा की अवधि न बढ़ पाने की है। पासपोर्ट बिशनसिंह दोसांझ के पास हैं। इसी कारण वह बिशनसिंह के खेतों में अवैध रूप से रहने लगता है। पासपोर्ट बिशनसिंह दोसांझ से लेना कठिन था, पर वह लेता है और मेक्सिकन लड़कियों के साथ फर्जी शादी करके ग्रींन कार्ड हासिल करता है । अमेरिका में स्थायी आवास के लिए शॉर्ट कट रास्ते खोजते और धोखाधड़ी करते भारतीय भी मिल जाते हैं। सुधा ओम ढींगरा की ‘पासवर्ड’ के प्रेमी युगल तन्वी और मनु अमेरिका में स्थायी तौर पर आना चाहते हैं। इसके लिए तन्वी अमेरिका में रह रहे साकेत से शादी करती है और अपने प्रेमी मनु को भी साथ ही लेकर आती है। उसकी योजना है कि वीज़ा लग जाने और अमेरिका मे रहने का स्थायी कार्यक्रम बनने के बाद वह साकेत को तलाक दे मनु के साथ रहेगी। वह साकेत के घर में उसकी अनुपस्थिति में सरे- आम मनु के साथ रंगरलियाँ मनाती फिरती है। तलाक की मांग छिड़ने पर मनु उसे झट से तलाक दे देता है। मुआवजे में 25 हज़ार डॉलर और बी. एम. डब्ल्यू॰ पाकर तन्वी और मनु के पैर ज़मीन पर नहीं लगते, लेकिन पुलिस जब दोनों के अमेरिका प्रवास को असंवैधिक घोषित कर उन्हें पकड़ लेती है तो तन्वी को एहसास होता है कि ग्रीन कार्ड हासिल करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। एक पूरी कानूनी/ संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरकर ही इसे पाया जा सकता है। चालाकियों से नहीं।

कड़वी सच्चाई यह है कि पासपोर्ट छीनकर, नौकर बनाकर, भारतियों को भारतीय ही, अपने ही शोषित करते हैं, उन पर अत्याचार करते हैं, बंधुया मजदूरों सा व्यवहार करते हैं। सुधा ओम ढींगरा की ‘वह कोई और थी’ में अमेरिका में भारत से इम्पोर्ट किए दूल्हे अभिनंदन का शोषण पत्नी और उसका परिवार ही कर रहा है। गरीबों की इच्छाएँ नहीं जरूरतें होती हैं। पिता की असमय मृत्यु, बहनों के विवाह की चिंता और मामा के दोस्त की अमेरिकन सिटीजन बेटी का रिश्ता आने पर अभिनन्दन को अमेरिका आना पड़ता है, लेकिन यहाँ आते ही उसे स्पष्ट हो जाता है कि वह पति या दामाद न होकर सिर्फ एक नौकर, एक मुंडु है। उसे अभिनन्दन से नंदू बना दिया जाता है। क्योंकि वर्क परमिट के लिए वह पत्नी सपना पर निर्भर है। पक्का ग्रीन कार्ड मिलने में तो वर्षों लगते हैं। वर्क परमिट और दो वर्ष का ग्रीन कार्ड मिल जाने के बाद भी गृहस्थ के लिए वह सपना की ज़्यादतियाँ सहने को विवश है। वह शांत महासागर हो जाता है, भीतर से कितनी भी लहरें उठें, ऊपर से धीर- गंभीर बना रहता है। अंतत: वह लगातार मिलने वाले अपमान से तंग आकर सारे रिश्ते तोड़ पासपोर्ट ले चुपचाप भारत के लिए निकल पड़ता है।

ग्रीन कार्ड की समस्या और देशी-विदेशी शादियाँ रचना श्री वास्तव की ‘भरोसा’ में भी चित्रित है। कभी स्नेह की सॉफ्ट वेयर इंजीनियर अभिषेक से शादी हुई थी। शादी नही, शादी के नाम पर धोखा। दो साल बाद जब किसी तरह स्नेह अमेरिका पहुंची तो पता चला की ग्रीन कार्ड के लिए अभिषेक किसी और से शादी कर चुका है। दिव्या माथुर की ‘प्रमाण’ ग्रीन कार्ड और एशियन्स के दोगलेपन की समस्या लिए है। पढ़ाई के सिलसिले में शगुन नौटिघम से लंदन आती है। पहली समस्या सस्ते और अच्छे मकान की है। आर्थिक तंगी या बचत के कारण वह भारत से किसी कंपनी के लिए आए आलोक से फ्लैट शेयर करती है। बेटी की शादी के लिए उतावली ममी आलोक से उसकी सगाई कर देती है। आलोक ग्रीन कार्ड पाने और मौज- मस्ती के लिए शादीशुदा होने के बावजूद यह सब कर रहा है। उसका पिता भी इस साजिश में शामिल है।

अर्चना पेन्यूली की ‘अनुजा’ में पति नरेंद्र मल्होत्रा ने पत्नी से सिर्फ कागजी तलाक लिया हुआ है। वह बार-बार शादियाँ रचकर असंवैधानिक तरीके से लोगों को डेन्मार्क में व्यवस्थित करवाता है और पति की मृत्यु पर पत्नी अनुजा को पता चलता है कि वह तो उसके द्वारा छोड़ी हुई किसी भी चीज़ की उत्तराधिकारी नहीं। क्योंकि कागजों पर तो उसका तलाक हो चुका है। जिस सपना को उसने इन दिनों व्यवस्थित किया था, कागजों में आज वही उसकी पत्नी है। वैधव्य, प्रवासी जीवन, पराई धरती, बच्चों के पालन पोषण का दायित्व– उसे अनवरत क्रंदन में छोड़ जाते हैं।

उनकी ‘मीरा बनाम सिल्विया’ में कोपेनहेगन के एस्कोन मंदिर को घाटे से उभारने के लिए भारत से आई-आई-टी इंजीनियर सद्भाव को तीन महीने के विजिटिंग वीजा पर धर्म प्रचार के लिए वहाँ भेजा जाता है। वह संस्थान के साथ-साथ उसके शाकाहारी रेस्टौरेंट गोविंदा को भी संभालने का यत्न करता है। वीजे की मुश्किलों का हल खोजा जाता है और सद्भाव की नकली शादी उस सिलविया से करवा दी जाती है, जिसका धंधा पैसों के बदले दूसरे मुल्कों के युवकों से शादी करना, उन्हें नागरिकता दिलाना और तीन साल बाद तलाक लेकर किसी अन्य से फिर नकली शादी करना है।

सुनीता जैन ‘काफी नहीं’ में बताती हैं कि विदेश में वीज़ा और नागरिकता की समस्या के कारण बहुत से लोग विशेषत: पंजाबी अपनी और वहाँ की सरकार को धोखा दे शादियाँ रचाते और निभाते है और हजारों अवैध प्रवासी विदेश बसने के स्वप्न के कारण वहाँ जेलों मे बंद हैं। विमान की यात्रा के दौरान नायिका जानती है कि उसकी सहयात्री का पति विदेश में वीज़ा और नागरिकता के कारण अपने से काफी बड़ी स्त्री का दस साल पति बनकर रहा । अपने ही बेटे को भांजा बताकर गोद लिया और फिर छोटे बेटे के जन्म के बाद पत्नी से कोर्ट मैरिज कर उसे भी कुछ देर के लिए बुला लिया। विदेश जाने के लिए उनके यहाँ लोग फर्जी शादियाँ भी करते हैं और तलाक भी लेते ही रहते हैं।

तस्वीर का एक और पहलू भी है। अति संवेदनशील मौकों पर भी वीज़ा लगने में कई- कई दिन लग जाते हैं। कई तरह की परेशानियाँ अलग घेरती हैं। पूरे अमेरिका में यही हाल है। इला प्रसाद की ‘वीज़ा’ का शुभेन्दु विगत बीस वर्ष से अमेरिका का नागरिक है। कलकत्ता में माँ की मृत्यु हो गई है। उसे भारत पहुँच कर शव को मुखाग्नि देनी है। वह तीन दिन से वीजा दफ़तर के चक्कर लगा रहा है। उन्हें पुराना पासपोर्ट चाहिए। वह शुभेन्दु को मिल नहीं रहा। दीपा को ससुर की मौत पर, अरुंधति को माँ की मौत पर, शकुन को पिता की मृत्यु पर ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ा था। अंतत: इमरजेंसी वीजा मिलता है। तब तक बहन गोपा माँ का संस्कार कर चुकी थी।

उषा राजे सक्सेना की ‘सलीना तो सिर्फ शादी करना चाहती है’ में अवैध इमिग्रेंट की दयनीय स्थिति चित्रित है। सलीना और बुखारी युगोस्लावाकिया से गैर कानूनी ढंग से ब्रिटेन मे बसे इमिग्रेंट हैं। तीन-चार वर्षों से अवैध ढंग से इस देश में रह रहे हैं। अवैध यानी तीसरे दर्जे के नागरिक। इनके पास न वोट का अधिकार है, न नेशनल इंश्योरेंस नंबर, न वेल्फेयर स्टेट की कोई सुविधा। कम पैसों मे देर रात तक अवैध फैक्टरी मे काम करते हैं। दब- छुपकर रहते हैं। कारावास का भय हर समय सिर पर मँडराता रहता है। उस दिन की प्रतीक्षा में हैं, जब सरकार उन्हें वैध घोषित करेगी।

उनकी ‘और जल गया उसका सर्वस्व‘ के गोपाल और सचिन अवैध रूप से लंदन में रहते हैं। दोनों मल्होत्रा साहिब के रेस्टोरेन्ट /बार में काम करते हैं और रात को वहीं किचन में छिपकर सो जाते हैं। वहाँ हर हफ्ते शोबना गाने के लिए आती है। शोबना को बलात्कार ने एक बेटी जिया दी है। दोनों शादी करते हैं। सचिन शोबना से शादी कर अवैधता से छुटकारा पाता है।

अर्चना पेन्यूली की ‘एक सुबह आप्रवासन कार्यालय में’ बताती है कि प्रवास में व्यक्ति की पहचान की सिर्फ एक ही कसौटी है- उसका पासपोर्ट- यानि वह किस देश से है। डेन्मार्क में रहने वाले प्रवासियों को हर साल वीज़ा रिन्यू करवाना पड़ता है। यह प्रक्रिया उन्हें एहसास दिलाती रहती है कि वे आप्रवासी हैं। लम्बी–लम्बी लाइनों में सुबह से शाम तक प्रतीक्षा काफी थका देने वाली भी होती है और ऊपर से त्रासदी यह है कि वृद्धों का वीज़ा रिन्यू नहीं किया जाता। यह वह देश है, जहां सिर्फ अपने लिए जिया जाता है। न युवा बच्चों का दायित्व लेते हैं और न वृद्धों का। अनाथालय और वृद्धाश्रम बच्चों- बूढ़ों के लिए हैं। नायिका एक सुबह आप्रवासन कार्यालय वीज़ा रिन्यू करवाने जाती है और यह सब देखती- महसूसती है।

पासपोर्ट और वीज़ा ही विदेश में व्यक्ति की पहचान हैं, लेकिन इन्हीं को लेकर हर प्रवासी का अपना दुख है। अपनों द्वारा हो रहे शोषण और स्वार्थप्रियता ने इस दुख को बृहदाकार कर दिया है। पराई धरती पर वह नितांत अकेला है और उसका रोजगार, वीज़ा, ग्रीन कार्ड का संघर्ष एकदम वैयक्तिक है। वह चक्रव्यूह में तड़फड़ा रहा अभिमन्यु है। कहीं वह बंधुया मजदूर बन, बैरा-मुंडू बन यहाँ –वहाँ छिपता फिरता है और कहीं चालाकियों से फर्जी शादियाँ कर ग्रीन कार्ड जुटा रहा है। जिजीविषा के लिए गैर कानूनी रास्ते, असंवैधानिक कार्य उसे अनुचित नहीं लगते, इनकी तो आदत सी हो गई है। कहीं अपनों के अत्याचार उसे वापिस आने को विवश भी कर रहे हैं। मुश्किलें तब और भी बढ़ जाती हैं, जब किसी आपात स्थिति में अपने देश आने के लिए भी उसे पासपोर्ट-वीज़ा कार्यालय के चक्कर पर चक्कर लगाने पड़ते हैं। विदेश की धरती पर अपना कद ऊंचा करने के लिए आया व्यक्ति तनाव पर तनाव झेलने के लिए अभिशप्त है।

संदर्भ:


1.उषा प्रियम्वदा, मछलियाँ, धर्मयुग, अप्रैल 1964
2.अर्चना पेन्यूली, एन. आर. आई., सरिता, दिल्ली
3.सुधा ओम ढींगरा, फंडा क्यों, कौन सी ज़मीन अपनी, भावना, 2011, दिल्ली
4.वही, पासवर्ड, हंस, जुलाई 2013
5.वही, वह कोई और थी, कमरा न. 103, हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, यू. पी. 2011
6.रचना श्री वास्तव, भरोसा, साहित्य कुंज, 13 मार्च 2014
7.दिव्या माथुर, प्रमाण, प्रवासी दुनिया, 3 अक्तूबर 2013
8.अर्चना पेनयूली, अनुजा, हंस, जून 2005
9.वही, मीरा बनाम सिल्विया, आधारशिला-97, दिसम्बर 2011
10.सुनीता जैन, काफी नहीं, हरिगंधा-241, सितम्बर 2014
11. इला प्रसाद, वीज़ा, कथा बिम्ब, जनवरी- जून 2014
12.उषा राजे सक्सेना, सलीना तो सिर्फ शादी करना चाहती है, वह रात और अन्य कहानियाँ, सामयिक, दिल्ली, 2007
13.वही, और जल गया उसका सर्वस्व, कथाबिंब, जनवरी-जून 2014
14.अर्चना पेन्यूली, एक सुबह आप्रवासन कार्यालय में, निकट, दिसम्बर 2010
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें