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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



विश्व हिंदी सम्मेलन और हिंदी भाषा


आनंद दास


हिंदी वृहद, परिपक्व तथा समृद्ध भाषा है। करीब डेढ़ अरब लोग हिंदी को जानते व समझते हैं। 'यूनेस्को' के अनुसार - ‘हिंदी दुनिया में अंग्रेजी और चीनी (मंदारिन) भाषा के बाद सबसे बड़ी भाषा है।’ लगभग 150 देशों में हिंदी शिक्षण व्यवस्था है। मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद एंड टोबेगो, फिजी और गयाना में तो हिंदी की पढ़ाई पाठ्यक्रम में शामिल है। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत के एक स्कूल में एकमात्र विदेशी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाई जाती है।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की पहल से सन् 1975 में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में आयोजित किया गया जहां विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्यालय मॉरीशस में स्था‍पित करने तथा केन्द्रीय विश्वविद्यालय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव पारित हुआ। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन से चतुर्थ सम्मेलन तक का विषय ‘वसुधैव कटुंबकम’ था। इसके बाद पांचवें विश्व हिंदी सम्मेलन ‘अप्रवासी भारतीय और हिंदी’, छठे सम्मेलन का विषय ‘हिंदी और भावी पीढ़ी’ था। सातवें सम्मेलन का विषय ‘हिंदी : नयी शताब्दी की चुनौतियां’ था। नौवें सम्मेलन का विषय ‘भाषा की अस्मिता और हिंदी का वैश्विक संदर्भ’ था तथा वर्तमान सम्मेलन यानी दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का विषय ‘हिंदी जगत् : विस्तार एवं संभावनाएं’ था। विश्व हिंदी सम्मेलन अब तक दुनिया के अलग-अलग शहरों में आयोजित किए जा चुके हैं। अब तक भारत में यह तीसरी दफा आयोजित किया गया है। दसवें विश्वे हिंदी सम्मेलन को भारत में आयोजित करने का संकल्प सितंबर, 2012 में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन में लिया गया था। इस तरह विश्व हिंदी सम्मेलन एक बार लंदन (यू.के.), एक बार पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड एंड टोबेगो), एक बार न्यूयार्क (अमेरिका), दो बार पोर्ट लुई (मॉरीशस), एक बार पारामारिबो (सूरीनाम) तथा एक बार जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में आयोजित हो चुका है।

हिंदी एक उदार भाषा है। हिंदी का राजनीतिक महत्व जितना है उससे कहीं अधिक महत्व साहित्यिक-सांस्कृतिक है। भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं – “जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख और इसके बाद सबसे बड़ा तू दिख।”1 हिंदी को जिस तरह बोला जाता है ठीक वैसे ही लिखा जाता है। यह इस भाषा की सबसे बड़ी वैज्ञानिकता है जो किसी अन्य भाषा में बहुत कम देखने को मिलती है। हमारे देश में कई बोलियां, भाषाएं तथा उपभाषाएं हैं पर भारत की सांस्कृतिकता तथा सामाजिकबोध हेतु हिंदी का अपना एक अलग ही महत्व है। हिंदी भाषा राष्ट्रीय चेतना व अस्मिता के लिए बोलियों की तुलना ज्यादा सक्षम है। यदि सभी बोलियां अपने अस्तित्व व अधिकार का दावा पेश करते हुए संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने लगी तब हिंदी की राष्ट्रीय छवि धीरे-धीरे बिखरने लगेगी और राष्ट्र भाषा के तौर पर संवैधानिक मान्यता भी नहीं मिल पाएगी। डॉ.अमरनाथ लिखते हैं – "जिस देश में खुद राजभाषा हिंदी अब तक ज्ञान की भाषा न बन सकी हो, वहां भोजपूरी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा देकर वे उन्हें क्या बनाना चाहते हैं? इनका तो कोई मानक रूप तक तय नहीं है, इसमें गद्य तक विकसित नहीं हो सका है।"2 भारत में हिंदी संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हो जाने के बाद भी तथा हिंदी विदेशों में प्रचार-प्रसार के बावजूद अपनी भाषा हिंदी ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान, प्रशासन और न्याय की भाषा नहीं बन सकी है। भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता को कमजोर व खंड-खंड करने के लिए साम्राज्यवादी शक्ति हिंदी को कमजोर करना चाहती है।

हिंदी के विकास तथा प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी संस्थानों को लाखों-करोड़ों रुपए दिए जाते हैं। लेकिन ढाक के तीन पात सरकारी बाबू तो सरकारी कागजों में खर्च का ब्योरा सहजता से दे देते हैं पर उस हिंदी का क्या होता है, क्या सही मायने में हिंदी का विकास हो पाता है? यह एक बहुत बड़ा सवाल है इसे हमें समझना होगा। हमारे देश में अंग्रेजी में हवाबाजी करने वाले व्यक्ति को ज्ञानी या समझदार मानते हैं जबकि हिंदी में बोलने वाले को साधारण, गंवार या पीछड़ा मानते हैं। भारत में जितने अंग्रेजीदां हैं उनमें ऐसे बहुत कम हैं जो उसी भाषा में सोचते हों और सीना ठोंक कर कह सकें कि वे उसी स्तर की अंग्रेजी जानते हैं जिस स्तर की हिंदी एक अच्छी हिंदी पढ़ा भारतीय जानता है। प्रो.सुधीश पचौरी कहते हैं- “हिंदी के उद्धार के नाम पर हमें इसका तमाशा नहीं बनाना चाहिए। सरकार और जो लेखक हिंदी के लिए रोना-धोना करते हैं मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। सरकारें भाषाओं को नहीं बचाती, जनता ही बचाती है। हमारे हिंदी के बुद्धिजीवी सामाजिक विषयों पर तो खूब बोलते हैं पर भाषा को बढ़ाने पर मौन रहते हैं। आज कमाई की भाषा हिंदी है पर खाती अंग्रेजी है। गाली हिंदी को मिलती है। ऐसी बड़ी जमात है जो खाती हिंदी की है पर गाती अंग्रेजी की है।”3 सरकारी बाबुओं की हिंदी केवल अंग्रेजी की गुलाम बन कर रह गई है। अंग्रेजी शब्दों के हिंदी अनुवाद को ही सरकारी तौर पर दुहराया जा रहा है। और इस अनुवाद की हालत क्या है इसका नज़ारा गूगल बता सकता है, पूरा अर्थ का ही अनर्थ कर देता है। इससे प्रायोगिक हिंदी और कठिन होती जा रही है। हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार कर के सरकार ने हिंदी को अंग्रेजी के पीछे-पीछे चलने के लिए मजबूर कर दिया है। इसे राष्ट्र भाषा की जगह राजभाषा की पहचान मिली और सारी गड़बड़ी की जड़ यही है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेहद 348 की धारा 1 (अ) स्पष्ट रूप से यह निर्देश देती है कि सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की समस्त कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होगी। भारतीय संसद को अनुच्छेद 120 धारा में संशोधन का अधिकार प्राप्त है। अनुच्छेद 120 धारा के आधार पर हिंदी को वैकल्पिक भाषा के रूप में जोड़ा जा सकता है। अनुच्छेद 120 भारतीय संसद में कार्यवाही करने से संबंधित, जो यह निर्देश देती है कि संसद की कार्यवाही अंग्रेजी या हिंदी भाषा में की जाएगी। जब संसद की कार्यवाही हिंदी में हो सकती है तो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में क्यों नहीं?

ऐसे में दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन बहुत लोकप्रिय तथा बहुचर्चित कार्यक्रम का आयोजन हुआ इतना चर्चित तथा भव्य भारत में कभी नहीं हुआ था। इसके उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बड़े-बड़े उद्योगपति तथा फिल्मी सितारे शामिल थे। हिंदी के प्रबुद्ध, ज्ञानी, विशेषज्ञ, साहित्यकार और भाषाविदों की बहुत बड़ी कमी थी। डॉ.अमरनाथ लिखते हैं– “जब नागपुर में पहला विश्वह हिंदी सम्मेलन हुआ था तो तत्का़लीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौजूदगी में मुख्य वक्तव्य महादेवी वर्मा से ही दिलवाया गया था लेकिन इस बार भोपाल में संपन्न हुए विश्व हिंदी सम्मेलन के मंच पर किसी भाषाविद्, साहित्यकार, कवि या कथाकार को जगह नहीं मिली।”4 सरकारी बाबुओं और बड़े-बड़े नेताओं के होने के बावजूद भी भारतीय भाषाओं की सर्वोच्च संस्था साहित्य अकादमी के नाम का भी पता नहीं था। सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदी में भाषण दिया था और विश्व की भाषा हिंदी को बनाने की बात कही थी। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की कोशिश से भारत सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिश की गयी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि– “हिंदी भाषा से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर और अनुवाद सेवाओं पर आने वाले लगभग 41 मिलियन डॉलर यानी करीब 250 करोड़ रुपये के वार्षिक खर्च को वहन करने के लिए भारत तैयार है।”5 जब अपने ही देश की राष्ट्रभाषा हिंदी नहीं है तो वह ‘विश्व की भाषा हिंदी’ कैसे बन सकती है? भारत को स्वतंत्र हुए कितने साल हो गए फिर भी हिंदी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन सकी है। हिंदी को हमदर्दी नहीं, अधिकार चाहिए। हिंदी से जुड़े सारे अनुच्छेंदों को कैसे संशोधित किया जाए और राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी को संवैधानिक मान्यता कैसे मिले हमें इस पर गंभीर रूप से चिंतन-मनन, विचार-विमर्श तथा लागू करने के लिए संकल्पबद्ध होना चाहिये। प्रो. सुधीश पचौरी ठीक ही कहते हैं – "सम्मेलन के बाद भी हिंदी का हाल वही रहता है जो सम्मेलन से पहले था।"6 हिंदी साहित्य सम्मेलनों से भरा पड़ा है पर भाषा समृद्धि को लेकर चिंतन तथा गंभीरता पूर्णतया गायब रहता है।


संदर्भ-सूची

1. राजस्थान पत्रिका, संपादक- गुलाब कोठारी, 14सितम्बर 2015, पृष्ठ संख्या– 2

2. सलाम दुनिया, संपादक-संतोष सिन्ह, 14सितम्बर 2015, पृष्ठ संख्या– 6

3. राजस्थान पत्रिका, संपादक- गुलाब कोठारी, 14सितम्बर 2015, पृष्ठ संख्या–8

4. सलाम दुनिया, संपादक- संतोष सिन्ह, 14सितम्बर 2015, पृष्ठ संख्या‍– 6

5. Youtube, राजस्थान पत्रिका, संपादक- गुलाब कोठारी, 14सितम्बर 2015, पृष्ठ सं.-8

6. राजस्थान पत्रिका, संपादक- गुलाब कोठारी, 14सितम्बर 2015, पृष्ठ संख्या– 8

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