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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



'पथ के साथी' में व्याप्त जीवन-दृष्टि


आनंद दास


महादेवी वर्मा जी का जन्म 26 मार्च सन् 1907 ई. को फरुखाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ था। कहते है उनके परिवार में 200 वर्षों में यानि सात पीढ़ियों से उनके घर में कोई पुत्री पैदा नहीं हुई थी। महादेवी के जन्म के बाद उनके परिवार ने उनको देवी माना और उनका नाम महादेवी रखा। उनकी शिक्षा इंदौर में हुई और वह संस्कृति, अंग्रेजी, संगीत तथा चित्रकला की शिक्षा घर पर ही दी जाती थी। महादेवी जी का सुभद्रा कुमारी चैहान से बहुत धनिष्ठता थी। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। उन्होंने बहुत सारे लेखन का कार्य किया। उनकी कविता संग्रह-नीहार, दीपशिखा, रश्मि, नीरजा, संध्यागीत इत्यादि है। उन्होंने रेखाचित्र और संस्मरण ललित निबंध कहानियां भी लिखे हैं। महादेवी वर्मा को छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती है। वह हिन्दीं साहित्य की श्रेष्ठ लेखिकाओं में से एक हैं। महादेवी अपने बारे में लिखती हैं – “एक व्यापक विकृति के समय निर्जीव संस्कारों के बोझ से जड़ीभूत वर्ग में मेरा जन्म हुआ परंतु एक ओर आस्तिक और साधनपूत भावुक माता और दूसरी ओर सब प्रकार की सांप्रदायिकता से दूर दार्शनिक और कर्मठ पिता ने अपने संस्कार देकर मेरे जीवन का जैसा किया, उसमें भावुकता बुद्धि के कठोर धरातल पर साधना एक व्यापक दार्शनिकता और आस्था–आस्तिकता एक सक्रिय चेतना पर ही स्थित हो सकती थी।”1 इनके संस्मरण हिन्दीं साहित्य की अनमोल निधियां हैं। इनके संस्मरणों में - ‘अतीत के चलचित्र’ (सन् 1941), ‘स्मृति की रेखाएं’ (सन् 1943) और ‘पथ के साथी’ (सन् 1956) प्रमुख है। महादेवी संस्मरण लेखन में अत्यंत ही उच्च पद की अधिकारिणी है। उन्होंने स्मृति के पात्रों के साथ स्वयं को इस प्रकार बांधा है कि पात्रों की जीवंतता के साथ उनका भी जीवनादर्श प्रकट हो जाता है। पात्रों के मन में पैठ कर उनका अंकन करना महादेवी खूब जानती थी। ‘अतीत के चलचित्र’ में मारवाड़ी सेठ की विधवा पतोहू, विमाता के अत्याचार का शिकार बिंदा, गुरू भक्त घीसा, वेश्या मां की सती पुत्री तथा लछमा आदि सभी पात्र समाज पीड़ित व्यक्ति है जिनकी करूण कथाओं को महादेवी ने उरेका है। 'स्मृति की रेखाएं' में भक्ति चीनी फेरी वाला, गुठीया, ठाकुरी बाबा आदि चित्र अंकित है जो अपनी पूरी सजीवता और साहित्यिकता के साथ चित्रित हुए हैं। इनके आर्थिक-सामाजिक और धार्मिक स्थितियों का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है लेखिका ने। महादेवी वर्मा रेखाचित्र और संस्मरण लेखन में बेजोड़ मानी जाती है इसका मुख्य कारण है कि वे अपने जीवन में आए पात्रों का वर्णन कुछ इस प्रकार करती हैं कि मानो महादेवी के मुख से स्वयं पात्र ही बोल रहा हो। ‘पथ के साथी’ नामक संस्मरण में लेखिका ने समकालीन साहित्य कार जैसे- पंत, निराला, मैथिलीशरण गुप्त आदि का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है जो अपनी संजीवता के साथ प्रकट होता है। इन पात्रों का महादेवी के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

‘पथ के साथी’ महादेवी वर्मा द्वारा रचित संस्मरण साहित्य है जिसका प्रकाशन सन् 1956 में हुआ था। इस रचना में महादेवी ने अपने समकालीन साहित्यकारों का वर्णन किया है जो अपनी विधा की बेजोड़ साहित्यिक कृति है। ‘पथ के साथी’ में महादेवी वर्मा ने अपने समकालीन लेखकों का वर्णन किया है। जिनमें रविन्द्ररनाथ टैगोर, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, जयशंकर प्रसाद, निराला और सियारामशरण गुप्त का वर्णन किया गया है। ‘पथ के साथी’ एक संस्मरणात्मक रचना है इनमें जिन कवियों का जिक्र महादेवी करती है उनसे वे अपने जीवन में गहरे रूप से जुड़ी है। लेखिका अपने जीवन में अनेक लोगों से जुड़ी जिनमें से कई के व्यक्तित्व से वे प्रभावित भी हुईं। सरल शब्दों में यदि कहा जाए तो अपनी गहराई में दूसरों को खोजना और दूसरों की अनेकता में स्वयं की तलाश महादेवी की विशेषता रही है।

‘पथ के साथी’ में चित्रित प्रत्येक कवि का व्यक्तित्व एक जीवन दृष्टि लिए हुए दिखाई देता है। इस संस्मरण में वर्णित सबसे पहले कवि रविन्द्र को महादेवी तीन प्रकार के परिवेश में देखती है जिससे उत्पन्न अनुभूति कोमल, प्रभात, प्रखर दोपहरी और कोलाहल में विश्राम का संकेत देती हुई संध्या के समान है। रविन्द्र के दर्शन ने महादेवी के कल्पना को अधिक सजीवता प्रदान की थी। उनका व्यक्तित्व महादेवी को घट के जल सा प्रतीत होता है। वे लिखती हैं – “वर्तमान विद्यार्थी को अपने संस्कृति को मानना तथा उनके जीवन मूल्यों को आत्मसाक्षात् करना चाहिए। अपनी पहचान बनाने के उपरांत ही वह अंतरराष्ट्रीय जगत् में भारत की पहचान बना सकता है।”2

महादेवी निराला में भाई-बहन का संबंध था, इस तथ्य की पुष्टि महादेवी स्वयं करती है। लेखिका ने कवि निराला के जीवन को बड़े निकटता से देखा था। विद्रोही कहे जाने वाला यह कवि जीवन में कितना अकेला, आधारभूत साधनों से हीन व्यक्ति है किन्तु उसका हृदय इतना सरल है कि दूसरे की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझता है। कवि की यह सहृदयता सिर्फ दिखावे की नहीं है। महादेवी एक स्थान पर कहती है – “सबेरे चार बजे ही फाटक खटखटा कर जब उन्होंने तार के उत्तर के संबंध में पूछा तब मुझे ज्ञात हुआ कि वे रातभर पार्क में खुले आकाश के नीचे ओस से भीगी दूब पर बैठे सवेरे की प्रतीक्षा करते रहे हैं।”3 निराला की यह चिंता उनके समकालीन कवि सुमित्रानंदन पंत जी के लिए थी जो टाईफाइड ज्वर से पीड़ित थे। निराला ने आर्थिक कमी देखी थी। यदि कहा जाए की जीवन जीने के लिए एक सामान्य व्यक्ति को जो साधन चाहिए होते हैं निराला उनसे वंचित रहे तो गलत न होगा। किन्तु इन विषमताओं को झेलते हुए भी उनके हृदय में कटुता की जगह सब के लिए ममत्व की भावना ही पली यह बड़ी बात है।

महादेवी ने जयशंकर प्रसाद की तुलना एक देवदारू वृक्ष से की है जो हिमालय की गर्वीली चोटी के समान ऊँचा है बड़े-बड़े आंधी-तूफान भी उसके जड़ को नहीं हिला पाते। महादेवी ने अपने संस्मरण में महान कवियों के हृदय को जैसे खोल कर रख दिया है। लेखिका की दृष्टि इतनी पैनी है कि चाहे प्रसाद हो या पंत उनकी दृष्टि सबको भेद लेती है। कोमलकान्ति कहे जाने वाले सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत के जीवन के पीछे छिपी कठोरता को महादेवी ने देखा था। एक बालक जो बचपन से ही मातृप्रेम की छाया से वंचित रहा था उसे यदि लोगों का प्रेम मिला भी तो सिर्फ दया के रूप में। पंत ने अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे थे किन्तु उनका चित्तर हमेशा प्रसन्न रहता था किसी मूल्यवान वस्तु़ को पा लेने का सुख और उसे खो देने का दु:ख ये दोनों बातें पंत के लिए अलग-अलग भाव न थे, अर्थात् वे जिस प्रकार खुश में प्रसन्न्चित्त होते थे उसी प्रकार दु:ख में भी। उनकी इसी विशेषता के कारण शायद वे हिन्दी के श्रेष्ठ कवि बने। एक तथ्य तो पूर्ण रूप से कहा जा सकता है कि कुछ विशेषताएं जो कवि को आम से खास बना देती है और जिसका उपयोग आम व्यक्ति भी अपने जीवन में प्रेरणा स्रोत रूप में कर सकता है। कोई भी व्यक्ति जन्म से खास नहीं होता उसे उसकी परिस्थितियां मूल्यवान बनाती है।

जिस तरह सोना आग में तप कर ही खरा होता उसी प्रकार साहित्यकार भी अपने परिस्थिति से उपजा होता है जो संघर्षरत होकर समाज में नयी जीवन दृष्टि की पहचान करता है। व्यक्ति के मानसिक विकास में शारीरिक रूग्णकता कभी बाधा नहीं डाल सकती। यदि व्यक्ति दृढ़ निश्चयी है तो वह कुछ भी कर सकता है। ‘पथ के साथी’ नामक संस्मरण में महादेवी जी ने इसी तथ्य को सियारामशरण गुप्त जी के माध्यम से दर्शाया है। गुप्त जी शरीर से कमजोर थे साथ ही एक साधारण व्यक्तित्व के स्वामी थे। गुप्त जी अपनी पत्नी से बहुत प्रकम करते थे। उन्होंने पत्नी की मृत्यु के बाद विरह वेदना को झेला था। पत्नी के प्रति उनका सारा प्रेम समर्पित था किन्तु उनकी मृत्यु के बाद वे उस क्षण बैठ कर रो भी नहीं पाए। गुप्त जी ज्यादा पढ़े लिखे भी नहीं थे, परंतु कविता करने का गुण उन्हें कहां से प्राप्त हुआ यह आश्चर्य में डालता है। सच ही है किन्तु गुप्त जी के जीवन की ये विषमताएं कभी उनके कविता व्यवहार में बाधा न बन पाई । उन्होंने आम आदमी की वेदना को सहते हुए मां सरस्वती की वंदना की है जो अपने आप में अनुपम कार्य है।

महादेवी के इस संस्मरण में सुभद्राकुमारी चौहान ही एक ऐसी नारी पात्र है जिन्होंने नारी जीवन की कठिनाइयों से लड़ते हुए भी अपने कवित्री अस्तित्व को कायम रखा। स्त्री समाज की उपेक्षा का पात्र बनती है। कई परंपराओं में बांध कर उसे रखा जाता है ताकि वह विकास न कर पाए। सुभद्रा जी ने भी अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों को झेला था। उन्होंने कई वर्ष जेल में काटे, बच्चों के लालन-पालन में आर्थिक दिक्कतों का सामना किया किंतु तब भी उनका विचार प्रगतिशील रहा। महादेवी केवल कविताओं के कानन की रानी नहीं है गद्यात्मक निबंधों में भी उनकी लेखनी बेजोड़ है। महादेवी के संस्मरण (पथ के साथी) में केवल वैचारिकता ही नहीं है बल्कि मानसिक गंथियों के साथ ही हृदयवादी आस्था भी प्रमाणित रूप से चित्रित हुई है। महादेवी एक विशिष्टथ संपन्न दृष्टि रखती है इसका प्रमाण उनके रेखाचित्रों और संस्मरणों में देखने को मिलता है। लेखिका के भाषा में एक ऐसी चित्रात्मकता है कि बिम्ब स्वत: ही आंखों के सामने उपस्थित हो जाता है।

‘पथ के साथी’ में महादेवी की पारखी दृष्टि सामने आई है। कई आलोचक बड़ी आसानी से कई बड़े-बड़े लेखकों या कवियों की प्रशंसा के पुल बांध देते हैं या उनकी आलोचना किसी न किसी विचारधारा के तहत कर देते हैं। यहां महादेवी भी एक आलोचक के रूप में खड़ी होती प्रतीत होती है जो अपने समकालीन कवियों को किसी विचारधारा के खांचे में खड़ा कर उसका मूल्यांकन नहीं करती। वे तो ऐसी प्रहरी हैं जो कवियों के हृदय में झॉंक कर उनकी विशेषताएं पहचान लेती हैं। कोई भी कवि (निराला, पंत या सुभद्रा कुमारी चौहान) उनकी पारखी नज़र से बच नहीं पाता। व्यक्ति अपने युग का सृष्टा कैसे बन सकता है या यूं कहें कि युग अपने रचयिता का निर्माण स्वयं कैसे करता है। एक साहित्यकार किन परिस्थितियों को झेल कर अपने युग का सृष्टा होता है यह महादेवी ने बखूब ही दर्शाया है।


संदर्भ-सूची

1. www.Pravasiduniya:com/Mahadevi-verma-Profileandbiography

2. वर्मा महादेवी, ‘पथ के साथी’, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ 46

3. वर्मा महादेवी, ‘पथ के साथी’, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ 46

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